शनिवार, 7 मई 2011

ओसामा जी

2 मई 2011, ओबामा ने दावा किया कि अमेरिका ने ओसामा को ठिकाने लगा दिया है.. और वह अब और आतंकवादियों को निपटाने में लग गया है.. इसका मतलब साफ़ है कि युद्ध शुरू हो चुका है.. ईसाइयों और मुसलमानों के बीच.. खैर वो सब तो बाद की बात है.. पर यह जो हुआ वो मुसलमानों के लिए अच्छा नहीं हुआ.. अमेरिका ने उनके ग्यारहवें पैग़म्बर को मार कर बहुत बुरा किया... इसीलिए तो तमाम मुसलमानों ने ओसामा के लिए फातिये पढ़े.. आँसू बहाए और विलाप किया..

चलिए ये सब छोड़िए... हमें तो मुसलमानों की फ़ितरत पता ही है.. हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ.. पर जरा दिग्विजय सिंह जैसे सैक्युलरों की भी सुनिए.. इन महाशय ने ओसामा के नाम के आगे इतनी बार जी लगाया जितनी बार अपने सगे पिता के नाम के आगे नहीं लगाया होगा.. पर ऐसा उस परम नीच व्यक्ति ने क्यों किया.. उसका मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान 'भाइयों' को खुश करना था.. ओसामा के मरने से ये बर्बर कौम काफ़ी दुखी है.. और दिग्विजय को भी लगता है कि ये नृशंस आतंकी को श्रद्धांजलि देने से इस पशु समान कौम को भी सान्तवना हो जाएगी.. बेचारा हिन्दू बस यही गाता रहेगा.. ईश्वर अल्लाह तेरो नाम..
2 मई 2011, ओबामा ने दावा किया कि अमेरिका ने ओसामा को ठिकाने लगा दिया है.. और वह अब और आतंकवादियों को निपटाने में लग गया है.. इसका मतलब साफ़ है कि युद्ध शुरू हो चुका है.. ईसाइयों और मुसलमानों के बीच.. खैर वो सब तो बाद की बात है.. पर यह जो हुआ वो मुसलमानों के लिए अच्छा नहीं हुआ.. अमेरिका ने उनके ग्यारहवें पैग़म्बर को मार कर बहुत बुरा किया... इसीलिए तो तमाम मुसलमानों ने ओसामा के लिए फातिये पढ़े.. आँसू बहाए और विलाप किया..

चलिए ये सब छोड़िए... हमें तो मुसलमानों की फ़ितरत पता ही है.. हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ.. पर जरा दिग्विजय सिंह जैसे सैक्युलरों की भी सुनिए.. इन महाशय ने ओसामा के नाम के आगे इतनी बार जी लगाया जितनी बार अपने सगे पिता के नाम के आगे नहीं लगाया होगा.. पर ऐसा उस परम नीच व्यक्ति ने क्यों किया.. उसका मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान 'भाइयों' को खुश करना था.. ओसामा के मरने से ये बर्बर कौम काफ़ी दुखी है.. और दिग्विजय को भी लगता है कि ये नृशंस आतंकी को श्रद्धांजलि देने से इस पशु समान कौम को भी सान्तवना हो जाएगी.. बेचारा हिन्दू बस यही गाता रहेगा.. ईश्वर अल्लाह तेरो नाम..

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कश्मीर भी गुजरात बनेगा

देशभक्तों,

कश्मीर की समस्या। हम जब से बड़े हुए तब से यही पढ़ते सुनते आ रहे हैं। कभी कश्मीरी पण्डितों का खदेड़ा जाना तो कभी खुले आम खून खराबा। और इसका कारण केवल और केवल घाटी के नृशंस मुसलमान। पर आज ये क्रूर कौम दुखी है। कारण है सुरक्षा बल जो इनकी हैवानियत के विस्तार पर थोड़ा अंकुश लगाने का प्रयास कर रहे हैं।

असल में लड़ाई झगड़ा दंगा फसाद मुसलमान की फितरत में है। क्या करें मुहम्मद लड़ाका था और इसीलिए उसने जो प्यार के संदेश दिए, जो अमन की इबारतें कुरआन में लिखीं और जो सपने उसने देखे उनको साकार करने के लिए उसके अनुयायी दुनियाँ भर में उत्पात मचाते घूम रहे हैं। पहले कश्मीर में हिन्दू मुसलमानो में झगड़ा हुआ तो हिन्दू शराफ़त से पलायन कर गए। फिर धीरे धीरे घाटी में बचे सिर्फ मुसलमान। अब कर्बला रे वीरों के पास कुछ नहीं बचा। उनके पाकिस्तानी भाई भी बोर होने लगे। फिर िन्होंने आपस में ही दंगे शुरू कर दिए। पुलिस ने रोका तो उसे भी मारा। फिर सेना की मदद ली गई तो रोने लगे।

खैर हमें इस देशद्रोही कौम से हमें कोई सहानुभूति नहीं। हमें तो उस दिन की प्रतीक्षा है जब कश्मीर भी गुजरात हो जाएगा। एक बार फिर छोटे से तूफान के बाद शान्ति हो जाएगी और विकास का चक्र तीव्र गति से घूमेगा।

रही बात मुसलमान की वो तो 1400 वर्ष से लड़ता रहा है। हिन्दू के साथ रहेगा तो हिन्दू से लड़ेगा। अनपढ़ होगा तो दंगे करेगा गोधरा जैसे जघन्य पाप करेगा। पढ़ेगा लिखेगा तो तौकीर बनेगा और बम बनाएगा। मुसलमान अगर अकेला रहेगा तो शिया सुन्नी की लड़ाई लड़ेगा। फिर उसके बाद कौन ज्यादा मुसलमान है इस बात के लिए संघर्षरत हो जाएगा।

पर हमें प्रतीक्षा है कश्मीर कब गुजरात बनेगा।

बुधवार, 17 मार्च 2010

कौन सा युवा?

बहुत दिन से एक 40 वर्षीय नेता को युवा शक्ति के प्रणेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। युवा को सपने दिखाए जा रहे हैं। यानी उसको महान बता कर एक बार फिर उसके मताधिकार का दोहन करने का प्रयास किया जा रहा है। और भारत का युवा इसी को सच मान कर सपने देख भी रहा है। वह भ्रम में है कि उसके दिन बहुरने वाले हैं। भले ही आवश्यक वस्तुओं के दाम गगनचुम्बी भ्रष्टाचार से नित नई ऊँचाइयाँ छू रहे हों पर उसको यह लगता है कि कुछ तो अच्छा होने ही वाला है।



हे परम भोले भारत के युवा पहले ठीक से ये तो समझ लो कि उनके युवा की परिभाषा क्या है। तुम सोचते हो कि तुम युवा हो क्योंकि तुम्हारी आयु 18 से 35 के बीच है। तुम्हें लगता है कि ये युवा अधिकारों की बात करने वाले महाशय तुम्हें नौकरी दिलाएँगे और तुम इनकी बातों पर विश्वास भी कर लेते हो। पर कभी इनके मधुर भाषण पर मुग्ध होने की बजाय तुमने इनकी नीतियों और इनके दावों को विवेक के तराजू पर तोलने का प्रयास किया? कभी अनुभव की ससौटी पर उन्हें कसने की कोशिश की? नहीं। इतना हमारी फटाफट जनरेशन कहाँ सोचती है? और नहीं सोचती इसलिए हमेशा एक ऐसी भीड़ के रूप में पिसती रहती है जिसका राजनीतिक स्वार्थों पूर्ति के लिए दोहन किया जा सकता है।



खैर जो तुमने आज तक नहीं सोचा वो मैं तुम्हें बताता हूँ।
पहले तो यह सोचो कि तुममें औऱ उनके युवा में क्या अन्तर है। तुम तो दिन रात मरते खपते रहते हो कभी डिग्री पाने की आस में तो कभी नौकरी की तलाश में। तुम कभी पेज थ्री पार्टियों में भी कभी नहीं गए। बड़े बंगलों में घुसने का सौभाग्य तुम्हें कहाँ मिला है। लम्बी गाड़ियों को देखकर तुम बस आहें ही भर सकते हो। सपने भी तुम स्कूटर या बाइक के देखते हो। तुम कहाँ से युवा की उनकी परिभाषा में फिट बैठते हो? हाँ तब बात और थी यदि तुम्हारे पीछे कोई नाम होता। तुम्हारे पूर्वजों ने किसी वंश की चरण वन्दनाएँ की होतीं। अगर तुम्हारे नाम के आगे गाँधी लगा होता तो फिर तो चाँदी ही चाँदी थी। चलो यह तो किस्मत की बात थी पर तुम संगमा, प्रसाद, पाइलट में से कुछ तो हुए होते। हाय री किस्मत तुम तो मिडिल क्लास में हुए हो तो तुम्हें कहाँ अधिकार है कि तुम बड़ा बनने की इच्छा रख सको। तुम कहीं से उनके यूथ के मापदण्डों को पूरा नहीं कर सकते। वो राजा हैं, और चमचे भी हैं पर तुम उनमें से कुछ नहीं। इसलिए अपने अधिकारों के लिए संघर्ष और इच्छा दोनों का ही त्याग कर दो। ऐसा उनका मंतव्य है।

अतः हे युवाओं जागो। बहुत दिवास्वप्न देख लिए तुम्हारी शक्ति तुम्हारे विवेक और संघर्ष में निहित है। विवेक को जागृत करो और संघर्षरत हो जाओ। तुम्हारी अधिकार प्राप्ति केवल क्रान्ति से ही सम्भव है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

भारतीयता का शत्रु उपराष्ट्रवाद

वन्देमातरम्,

हे देशप्रेमियों इतने मैं आज बहुत समय बाद लेख लिखते हुए प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। मै हमेशा से मानता आया हूँ कि विचारों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति के लिए चिन्तन, मनन व अनुभव की गहन आवश्यकता होती है। और यदि इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव हो जाए तो आदमी राहुल गाँधी और बाल ठाकरे जैसा छिछला हो जाता है और उसके विचार और भाषण उसी की तरह ओछे हो जाते हैं।

खैर हम अपने विषय की ओर बढ़ते हैं। उपराष्ट्रवाद हमारे देश के लिए इसलाम के बाद दूसरा बड़ा प्रश्न बन कर उभर रहा है। यह हमारी पवित्रतम मातृभूमि के प्रति उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि मुसलमानों का इस धरा पर होना। साधारण व्यक्ति को पता ही नही कि आखिर ये उपराष्ट्रवाद है क्या, ये कहाँ से आया क्यों है औऱ देश को किस रास्ते ले जाएगा। मैं बताता हूँ। ये बड़ी बातें हो सकता ह कि आम समझ से परे हों लेकिन उदाहरणों से सब स्पष्ट हो जाएगा। कुछ बातें हम प्रायः सुनते है जैसे-

1.भगत सिंह को पंजाबियों द्वारा शहीदे आज़म बताया जाना।
2.मराठियों द्वारा वीर शिवाजी का गुणगान।
3.बंगालियों का नेताजी की वीरता का बखान।
4.तमिलों का अपनी भाषा और संस्कृति पर अत्यधिक गर्व।
अब आप कहेगे कि इसमें बुरा क्या है। इसमें कौन सी बात है जो कि देश के लिए खतरा बन सकती है। मैं कहता हूँ कि यह बहुत बड़ा खतरा है ठीक इसलाम की ही तरह। कैसे ये मैं बताता हूँ।

भगत सिंह, शिवाजी और नेताजी सुभाष निश्चय ही देश के महानतम सपूतों में से थे इनकी वीरता, शौर्य और देशभक्ति अभूतपूर्व थी। पर जब इन महापुरुषों का गुणगान लोग अपने क्षुद्र राजनीतिक लाभ के लिए करते हैं तो यह उपराषट्रवाद कहलाता है। मान लीजिए कोई पंजाबी भगत सिंह को शहीदों का राजा बताए तो क्या कोई उत्तर प्रदेश वाला चन्द्रशेखर आज़ाद और राम प्रसाद बिस्मिल को दरबारी मान लेगा? या फिर नेता जी की वीरता की रट लगाने वाले बंगाली की बात मानकर कोई गुजराती सरदार वल्लभ भाई से ऊपर समझ लेगा? तमिल भाषा एक महान भाषा है पर इसका एक अर्थ क्या ये भी है कि हिन्दी और संस्कृत उससे कमतर हैं?
इसका एक उत्तर है नहीं। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए हम अपने महापुरुषों को महान और सबसे महान बताते हैं और यह एक प्रतिक्रिया को जन्म देता है। एक औसी प्रतिक्रिया जिसमें एक क्षेत्र का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र के महापुरुष पर कीचड़ उछालता है।
पर इतनी बात राज ठाकरे, बाल ठाकरे जैसे हिन्दुओं की समझ में नहीं आती तो राहुल की तो क्या कहें। आम हिन्दू जितनी जल्दी ये बात समझ ले उतना अच्छा।

भारत माता की जय!

मंगलवार, 23 जून 2009

बाबा भक्तः मूर्ख या स्वार्थी या दोनों?

देशभक्तों,

पिछले लेख में जब साँई के पाखण्ड को मैंने सिद्ध किया उसपर मुझे कई प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं। कई साँई भक्तों ने भी मुझे ऐसा ‘पाप’ करने से मना किया पर इस प्रश्न का कोई उचित जवाब नहीं दे पाया कि साँईँ की भक्ति क्यों की जाए?

असलियत मैं बताता हूँ। तथाकथित भगवान साँई बाबा के भक्त दो तबकों में बँटे हुए हैं। पहला तबका वह है जिसने साँईं की मार्केटिंग की उसको बेचा और शिरडी को विश्व प्रसिद्ध कर दिया। इन व्यापारी भक्तों ने इतनी सफाई से सूर्य की रोशनी से लेकर वर्षा तक को साँई का एहसान बताया ताकि इनका पाखण्डी बाबा सोने के आसन पर बैठ सके। फिर क्या था? शिरडी के व्यापार की दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की को देख कर देश के कोने कोने में साँईं के मन्दिर खुल गए, चढ़ावे आने लगे। फिर इस साँईँभक्त वर्ग को लगा कि इस चीज़ को मीडिया और बढ़ा सकता है। फिर तो रातोंरात साँईँ की फोटो पर टँगी मालाएँ लम्बी होने लगीं। भक्त और बढ़े, चढ़ावा और आया, कैमरे आए, पत्रकार आए, इण्टरव्यू हुए और साईँ खुश हुआ। धन्धा और आगे चला और मज़े से बढ़ रहा है।

अब बात करते हैं दूसरे साँईँराम भक्त वर्ग की। यह वर्ग उन भक्तों का है जो निहायत ही भोले किस्म के हैं। ये लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी भी बाबे को भगवान कहने से नहीं हिचकते, अपने घर की सुख समृद्धि के लिए किसी के भी चरण चाट सकते हैं, साँईं नामक मुसलमान के पैर पूजते हुए भी इनको लज्जा नहीं आती।

अरे साँईं भक्तों तुम प्रेत पूजा करके कितना निन्दनीय कार्य कर रहे हो तुम्हें नहीं मालूम। अब आँखें खोलो और जागो। आज हिन्दुत्व को एकता की आवश्यकता है। मैं फिर कहता हूँ कि भारत माता ही एक मात्र देवी है। साँईं एक छलावा है, ज़्यादा से ज़्यादा एक दलाल जो तुम्हें सुख देने का, भगवान के पास ले जाने का ढोंग करता है। जिससे उसके अनुयायी भोले भाले देशवासियों को लूटें और देश को कमज़ोर करें। छोड़ो ऐसे आध्यात्मिक घटियापन को और देश की पूजा करो। भारतीयता का जो वरदान तुम्हें मिला है उसका सम्मान करो।


भारत मात की जय!

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

साँईं बाबा: धार्मिक पाखण्ड का दूसरा नाम

देशभक्तों,

हमेशा ही हमारी हिन्दू कौम भोली रही हो ऐसा नहीं है। हिन्दू इतना स्वार्थी भी है कि अपने जरा से स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी को भी भगवान मान सकता है। किसी किसी कीभी आराधना शुरू कर सकता है। किसी भी ऐरे गैरे के प्रति अपनी आस्था प्रकट कर सकता है। ऐसे में उसे देश हित, धर्म हित की कोई चिन्ता नहीं रहती। वह अपने मतलब के लिए किसी को भी सन्त मान कर भगवान बना सकता है।

कोई जरा सा चमत्कार क्या दिखा दे वह भगवान माना जाने लगता है। आधुनिक काल में लोगोंने साँईं बाबा को ही भगवान मान लिया। और साँईं के जीवन काल से लेकर आज तक उनकी दुकानबहुत बढ़िया चल रही है। अगर को हममें से कोई कहे कि मेरे घर की घरती पर कोई कदम रखेगा तो उसके दुख दर्द दूर हो जाएँगे, दुखियों के दुख मेरे घर की सीढ़ी पर पाँव रखते ही मिट जाएँगे और मरने के बाद भी मैं अपनी कब्र से क्रियाशील रहूँगा तो आप और हम सब हिन्दू उसे पाखण्ड मानेंगे। पर साँईं बाबा के इस पाखण्ड को सबने मान लिया और कुछ धर्मद्रोहियों ने तो उन्हें शिव और दत्तात्रेय का अवतार तक बना डाला। एक ऐसे व्यक्ति को बिठा कर मन्दिरों को भ्रष्ट जैसा जघन्य अपराध करने में लग गए। हम जानते हैं कि साँईं बाबा के माता पिता और उन्के जन्म का किसी को नहीं पता। साँईं ने पहले अपनी मार्केटिंग की, भक्त बनाए फिर भक्तों ने बाबा की मार्केटिंग की और बाबा सन्त से भगवान बना दिए गए।

अत: हे हिन्दुओं इस दिमागी दिवालिएपन और वैचारिक घटियापन से ऊपर उठो। देश को तुम्हारी आवश्यकता है। अगर कोई देवी है, कोई भगवान है तो वो सिर्फ़ भारत माता है। तुम्हें समय समय पर नए नए भगवानों की आवश्यकता रहती है पर उस देवी के प्रति कोई श्रद्धा नहीं कोई कृतज्ञता नहीं जो तुम्हें पीने के लिए पानी और साँस लेने के लिए हवा प्रदान करती है। ऐसी जीवनदायिनी माता को याद कर लो मुक्ति निश्चित है। किसी साँई और किसी बाबा की फिर कोई ज़रूरत नहीं।

भारत माता की जय!

सोमवार, 30 मार्च 2009

हिन्दू हित या स्वार्थसिद्धि?

देशप्रेमियों,

आज देश भर में वरुण गाँधी के बयान पर बवाल हो रहा है। कई लोगों की भावनाएँ आहत हुई हैं तो कई हिन्दू वरुण को हिन्दुओं का मसीहा मानने लगे हैं। पर इसे हिन्दू धर्म का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हर नेता हिन्दू और उसकी भावनाओं का लाभ उठाना चाहता है। ऐसे में वरुण गाँधी जैसे ओछे रानेताओं की मंशा क्या होती है, मैं बताता हूँ।

क्या आप जानते हैं कौन हैं ये वरुण गाँधी? सिवाय इसके कि ये भी नेहरू गाँधी परिवार के कुलदीपक हैं। हम भी नहीं जानते। कौन हैं कहाँ से आए और क्यों भाजपा में इतनी सम्मान से लाए गए और तो और काडर की बात करने वाले आरएसएस की नागपुर बैठक मंच पर बैठाए गए? क्या वर्ष 2004 में अपनी माँ के चुनाव प्रचार और 2009 में पीलीभीत के अलावा बीच में आपने कभी इन्हें देखा? आप तो खुश हो गए उन्होंने गालियाँ दे दीं और वो भी निहायत ही घटिया लहजे में, घटिया भाषा का प्रयोग किया और सही मायने में अपने घर से मिले संस्कार दिखा दिए। जिस भाषण शैली का उन्होंने प्रयोग किया वो किसी प्रबुद्ध, संस्कारी हिन्दू की थी ही नहीं।




सच तो ये है कि वरुण जैसे नेता देश या धर्म की नहीं सोचते अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। देशद्रोह, गद्दारी और हिंसा तो मुसलमानों के रक्त में व्याप्त है वो अपने नैसर्गिक गुणों को नहीं त्याग सकता। ये तो अल्लाह का नूर है जो मुहम्मद के मुख से टपका है और मुसलमान उसे बटोर बटोर कर इंसानों तक पहुँचा रहे हैं। आतंकवाद एक आम मुसलमान का फुल टाइम जॉब है पर वरुण जैसे नेताओं को इसका ध्यान केवल चुनावी मौसम में आता है। तब कहाँ थे वरुण गाँधी जब 13 मई 2008 को जयपुर घायल हुआ था, अहमदाबाद में हिन्दू मरा था और बेंगलुरु रोया था? क्या उन्हें 13 सितम्बर को दिल्ली का क्रन्दन नहीं सुनाई दिया। तब इसलाम ने पशुता की सारी सीमाएँ लाँघ डाली थीं और वरुण गाँधी कहीं नहीं थे। वरुण तो वरुण हिन्दुत्व के महानायक नरेंद्र मोदी क्या कर रहे थे?

सच तो ये है कि जिसे तुमने तारणहार माना, जिससे आशा की उसी से धोखा मिला। पर अब समय है सोचने का और जानने का और वरुण जैसे स्वार्थी नेताओं की राजनीति को न चलने देने का। क्योंकि इससे नुकसान देशद्रोहियों को नहीं स्वयम् हिन्दुओं को है। हमारी लड़ाई मुसलमानों के विरुद्ध नहीं इसलाम के विरुद्ध है क्योंकि इसलाम देश का नासूर बन चुका है। साथ ही साथ वरुण जैसे नेताओं को भी समझा देना है कि हिन्दू किसी के हाथ की कठपुतली नहीं न ही वो वोट बैंक है। वो भारत माता का सच्चा सपूत है। जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए स्वयमेव सक्षम है। उसे वरुण गाँधी जैसे किसी विधर्मी की ज़रूरत नहीं

भारत माता की जय!

शनिवार, 3 जनवरी 2009

नया तंत्र नई व्यवस्था

इस राष्ट्र के जनतन्त्र घोषित होने के बाद कई राजनीतिक दलों ने जनता के माध्यम से अपना उल्लू सीधा करने के लिए जनसाधारण की अल्पबुद्धि को ही अपना हथियार बनाना उचित समझा। अपने अपने ढंग से वायदे. कायदे समझाए गए और सत्ता प्राप्ति के प्रयास निर्लज्जता से किए जाने लगे। गरीबी हटाओ से लेकर हिन्दुत्व लाओ तक कई मुद्दे लाए गए पर खेद के साथ कहना पड़ता है कि न तो ग़रीबी गई न हिन्दुत्व आया। सत्तालोलुप नेताओं के लिए पहले आलेखों में भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसलिए उनके चरित्र का वर्णन पुन: करना निरर्थक है।

हर साधारण व्यक्ति यह जानता है कि देश के नेता जिस गति से राष्ट्र को पतन की ओर ले जा रहे हैं उसके परिणाम क्या होंगे। फिर भी वह विवश है। क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं। वो सिर्फ़ ये कहके संतोष कर लेने पर मजबूर है कि सब चोर हैं और जो चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा। आम आदमी परिस्थितियों में परिवर्तन की आशा लगभग छोड़ चुका है। पेज थ्री के लोग यानी आचार विचार रहित जनता जो देश की जनसंख्या का मात्र 6% ही है, मौज काट रही है। मुसलमान और मार्क्सवादी देशद्रोह के नए नए आयाम तलाशने में जुटे हैं और प्रतिदिन नीचता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

पर स्थिति को बदलना होगा। परिस्थितियों में परिवर्तन आवश्यक है। और ये सब कैसे होगा मैं बताता हूँ।

आज भारत माता के इस मुश्किल वक्त में जहाँ हमें 16 करोड़ आईएसआई के एजेण्टों अर्थात् सच्चे मुसलमानों के बीच रहना पड़ रहा है वहीं ग़द्दार साम्यवादियों को झेलना हम सबकी मजबूरी है। देश को सेक्युलरवादियों से भी ख़तरा है पर परिस्थितिवश हमें इनके साथ रहना ही पड़ता है। स्थिति जटिल अवश्य है पर अपरिवर्तनीय नहीं। इसको बदलने के लिए हम सबको आगे आना होगा। और हमें किसी भी कुर्सी का मोह त्यागना होगा। लड़ाई सत्ता के लिए नहीं अपितु विचारधारा के लिए लड़ी जाएगी, देशहित के लिए लड़ी जाएगी। जंग देश के तमाम आत्महत्या करने पर मजबूर किसानों के लिए होगी, उन जवानों के लिए होगी जो देश के लिए बलिदान देने को तत्पर रहते हैं। उस सरकारी कर्मचारी के लिए होगी जो जीवन भर कलम घिसता रहता है और पीएफ़ की दरें बढ़ने पर ही खुश हो जाता है।

राष्ट्रप्रेमियों यदि हम अपने ये मुद्दे जनता को भली भाँति समझा पाए तो सत्ता के लिए किसी संघर्ष की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। हमारे इरादे और हमारे विचार साफ़ हैं। हमें किसी प्रकार की न तो कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है न ही सत्ता की कोई लिप्सा। भले ही सफलता प्राप्ति में हमें थोड़ा समय लगे, थोड़ा संघर्ष करना पड़े पर हम सफल होंगे ही ऐसा मेरा मानना है। बस हमें तर्कसंगत बात को अपनाना है और ये समझ लेना है कि कोई भी कानों को अच्छी लगने वाली बात जो किसी मुसलमान या मार्क्सवादी के मुख से निकली है वो अच्छी नहीं होगी क्योंकि वो अच्छी हो ही नहीं सकती। तब हम अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा पर अटल अडिग रह पाएँगे अन्यथा अन्त निश्चित है।

Email Id: matribhoomibharat@gmail.com

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

शहीद:19 दिसम्बर 1927

16 दिसम्बर 1927 की रात। डीएसपी शफ़ीकुर्रहमान अपनी पत्नी मज़हर्रुन्निसा को एक काग़ज़ देते हैं जिसे लेकर वो सीधे फ़ैज़ाबाद जेल पहुँचती हैं। वो अन्दर जाती हैं और पर्चा जेल में बन्द अपने बेटे को देती हैं। ये पर्चा एक माफ़ीनामा है जिससे उस नौजवान की सज़ा कम हो सकती है। पर वो एक नज़र पर्चे को देखता है फिर अपनी माँ से कहता है-

“इस मुल्क के करोड़ों मुसलमानों में से आज तक कोई भी मादरे वतन के लिए नहीं मिटा। तू भी मुझे रोक रही है”

यह कह कर अश्फ़ाकुल्लाह ख़ान ने पीठ मोड़ ली और काकोरी काण्ड के मुजरिम के तौर पर 19 दिसम्बर 1927 को हँसते हँसते चढ़ गया फाँसी। देश के एक सच्चे सपूत की भाँति। एक सच्चे वीर की तरह

19 दिसम्बर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को भी काकोरी काण्ड मामले में ही गोरखपुर जेल में सूली पे चढ़ा दिया गया। शायद राष्ट्र के प्रति बलिदान देने की जिजीविषा उनमें इतनी थी कि उन्होंने पहले ही लिख दिया था-

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


कहते हैं जो समाज अपने शहीदों को भुला देता है, वीरों के बलिदानों को तिलांजलि दे देता है वो मिट जाता है। और यही शायद हमारे साथ हो रहा है। ठीक तीन महीने पहले जामिया नगर मुठभेड़ हुई थी। उसमें मारे गए देशद्रोहियों की कब्रों पर फातिहे पढ़े गए थे, उनकी मौत से क्षुब्ध होकर ईद नहीं मनाई गई थी। पर अश्फ़ाकुल्लाह जैसे शहीद को श्रद्धञ्जलि देने के लिए किसी इमाम के पास समय नहीं था। क्योंकि अश्फ़ाक़ इस्लाम के लिए नहीं देश के लिए शहीद हुआ था। उसका लक्ष्य सत्ता नहीं देश की मुक्ति था। शायद इसीलिए मुसलमानों की निगाह में वो नायक नहीं, वीर नहीं। क्योंकि इस्लाम की तो शुरुआत मुहम्मद ने मक्के की सत्ता हथियाने के लिए की थी। इसी की शिक्षा उसने दी तभी तो चाहे वो अबू बकर हों, अली हों हों सारे ख़लीफ़े पिछले वाले को मारकर ख़लीफ़ा बने। पर अश्फ़ाक ने तो देशहित में काम किया था। वो देश की कुर्सी के लिए तो लड़ाई ही नहीं कर रहा था फिर मुसलमान उसे कैसे महान् और सच्चा मुसलमान मानते। पर मैं जानता हूँ कि मेरी और मेरे जैसे राष्ट्रवादियों की दृष्टि में अश्फ़ाकुल्लाह ख़ान महान् हैं।


matribhoomibharat@gmail.com

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

बन्द करो सम्मान...., बहुत हुआ सम्मान....

देशभक्तों,

यूँ तो मैं आत्मदया और बुरे अनुभवों के प्रचार के माध्यम से किसी क्रान्ति की अपेक्षा नहीं करता। पर आज, यानी राष्ट्रीय शर्म की सातवीं बरसी पर मन कुछ दुखी था। इसलिए यदि इस आलेख से चित्त थोड़ा खिन्न हो जाए तो आप मुझे क्षमा करेंगे। ऐसी मैं आशा रखता हूँ।

यह एक विडम्बना ही है कि 6 और 13 दिसम्बर ये दोनों ही दिनांक साल में एक ही दिन पड़ती हैं। पहली जहाँ हमें हिन्दू शौर्य का स्मरण कराती है वहीं दूसरी हमारे नेताओं की अकर्मण्यता की याद दिलाती हैं। यहाँ मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा। इन दोनों ही घटनाओं के उत्तरदायी दो व्यक्ति है।

हमारे हिन्दू शूरवीरों ने जिस योजनाबद्ध तरीके से एक राष्ट्रीय कलंक को 6 दिसम्बर 1992 को धोया उस योजना के पीछे दो सत्ता के लालची लोगों का हाथ था। एक ने तो सत्ता का पूर्ण सुख भोग लिया पर दूसरा अभी भी कतार में है। यह व्यक्ति 13 दिसम्बर 2001 की घटना के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है। इस सत्तालोलुप व्यक्ति को आजकल भारत के प्रतीक्षारत प्रधानमन्त्री के नाम से भी जाना जा रहा है। असल में इसने भारत भूमि पर राज करने के लिए हिन्दुत्व का भी जमके सहारा लिया अपना उल्लू सीधा किया पर अब बदले माहौल को देखकर सेक्युलरवाद की राह पकड़ अपनी स्वार्थसिद्धि की कामना कर रखता है।

यदि यह हाल है आदर्शवादी और इमानदार माने जाने वाले नेताओं का तो तमाम सेक्युलरवादियों और अन्य दलों के नेताओं से कोई भी आशा रखना मूर्खता ही है।

पर कभी आपने यह सोचने का कष्ट उठाया कि हर नेता आपकी इच्छाओं, आपके विचारों, आपकी आस्थाओं को कुचलने को क्यों तैयार रहता है?

मैं बताता हूँ। जिस सत्ता को जनसाधारण के लिए विकासशील नीतियाँ बनाने का साधन होना चाहिए था, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए एक माध्यम होना चाहिए था वह सत्ता स्वयम् ही साध्य हो गई।

इसके बाद तो भारतवर्ष के स्वार्थी नेता सत्ता रूपी वारंगना की सुगन्ध पाकर ही एक व्यभिचारी समान आचरण करने लग गए। कइयों के लिए संसद गन्तव्य हो गई तो कुछ ने विधान सभा को ही अपने जीवन का अन्तिम लक्ष्य मान लिया। जो छुटभैये थे वो निगम पार्षद बन कर अपना जीवन सफल समझने लगे, जिनकी महत्वाकांक्षा ऊँची थी वह येन-केन-प्रकारेण मन्त्री बनने के लिए रस्साकशी करने लगे। जो जीता उसने सरकार नाम की नगरवधू का भरपूर आनन्द लिया, जिसकी दाल नहीं गली वह अपना मुँह छिपा कर निकल लिया। हर बार हारी तो सिर्फ़ जनता। हिन्दू के नाम पर वोट देने वाली जनता, विकास की आशा लगाने वाली जनता, ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने वाली जनता, ऐसे स्वार्थी नेताओं के लिए आपस में सिर फोड़ने वाली जनता।

किसी ऐसे व्यक्ति को सत्ता तक ले जाना कहाँ तक उचित है जिसकी विचारधारा समय और परिस्थितियों के साथ बदलती रहे? जो बात करे हिन्दुत्व की और इफ़्तार देशद्रोही मुसलमानों के साथ करे? ऐसे में नेता को बदला जाए या तन्त्र को? या ऐसे विधान और संविधान को जो देशभक्तों और देशद्रोहियों को समान अधिकार देता है?

इस बार टिप्पणी नहीं इस प्रश्न के उत्तर की आशा रहेगी।

Email Id: matribhoomibharat@gmail.com

रविवार, 7 दिसंबर 2008

टिप्पणी पर टिप्पणी

मैं इस ब्लॉग के माध्यम से जहाँ अपनी बातें कई समान विचारधारा रखने वाले लोगों तक पहुँने में सफल हुआ हूँ वहीं कई राष्ट्रद्रोहियों और मूर्ख सेक्युलरवादियों ने दिल खोलकर मेरी निन्दा की है। ऐसे देशद्रोहियों को तिलमिलाते, छटपटाते और कराहते देखने में मुझे और मेरे कई साथियों को हर्ष व गर्व की मिश्रित अनुभूति हुई। एक ऐसे ही भाई हैं आलोक कुमार पाण्डेय जिन्होंने साम्यवाद पर हमारे प्रहारों से विचलित होकर कुछ इस तरह की टिप्पणी दी है-


"आप जैसे पागल लोगों ने इस देश को कत्लोगारत का मैदान बना दिया है।
भगत सिंह ने कहा था सांप्रदायिक होना इंसानियत का दुश्मन होना है ...आप हैं
हिन्दुस्तान किसीके बाप का नहीं है
खदेडा मोदी को करकरे के घरवालों ने भी था उसकी बात क्यों नहीं करते?
लाशों पर सत्ता के महल बनाने वालों के अंत से ही यह देश प्रगति करेगा
और ये होगा ही।"



इस पर भी इन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लीजिए दूसरी टिप्पणी चिपका दी-

"राष्ट्रवाद भी विदेशों में ही जन्मा है ... ये लेखक हिटलर की किताब पढता है और मार्क्सवाद को गाली देता है"


मैं बताता हूँ इसमें ऐसे लोगों की क्या मंशा होती है। असल में इन लोगों के पास कहने को कुछ ठोस होता नहीं क्योंकि इन्होंने बाबा मार्क्स के आगे कुछ सोचा ही नहीं। जो उन्होंने अपनी किताब में लिखा वो इन्होंने कण्ठस्थ कर अपने गर्धवालाप में प्रस्तुत कर दिया। साथ में अपनी इस घटिया बात को भगत सिंह जैसे देशभक्त की बात से भी अलंकृत कर दिया।

इन भाई साहब को यह भी लगता है कि मैंने अपने सारे विचार केवल हिटलर की माइन कैम्फ़ (शायद इसका ये नाम नहीं जानते) पढ़ कर बनाए हैं। कल को यदि आपको मेरे ब्लॉग पर यह सूक्ति पढ़ने को मिले-

“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”

तो राष्ट्रवाद को विदेशी विचारधारा बताने वाले पाणडेय जी के अनुसार मैंने यह भी हिटलर की किताब से उठाई होगी। खैर अब सिद्ध करने या तर्क देने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि कम्युनिस्टों का भेद अपने आप खुल चुका है।

इसलिए हे देशभक्तों!! जनता को रोटी कपड़ा और मकान को अहमियत और राष्ट्रवाद को ताक पर रखने वाली विचारधारा का अन्त समीप है। तुम्हें अपनी ठोकरों से साम्यवाद की गिरती दीवार पर प्रहार करके उसका खात्मा करना है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 16 साल पहले तुमने कुछ देर में ही बाबरी मसजिद को मटियामेट कर दिया था।

ईमेल- matribhoomibharat@gmail.com

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

मार्क्सवाद और इस्लाम- राष्ट्रद्रोह के प्रबल अध्याय

देशप्रेमियों!!

26 से 29 नवंबर तक मुंबई में जो देश ने देखा वो सच्चे इस्लाम का चेहरा था और उसके बाद जो भी कुछ हुआ उसने मार्क्सवाद को बेनक़ाब कर दिया। लोगों ने महसूस किया कि दोनों समुदाय राष्ट्र के प्रति कितनी दुर्भावना रखते हैं। पहले तो अल्लाह के नेक बन्दों ने हमारे 185 निर्दोष लोगों को नृशंसता से मार डाला और फिर उसके अगले ही दिन जब राजनैतिक दबाव में केरल की साम्यवादी सरकार के मुख्यमंत्री मेजर सन्दीप को श्रद्धांजलि देने पहुँचे तो उनके पिता उन्नीकृष्णन द्वारा बाहर खदेड़ दिए गए। इसके बाद खिसिया के उन्होंने जो बयान दिया वह उनकी तुच्छ मानसिकता और ओछी विचारधारा का परिचायक है। उनकी घृणित टिप्पणी मैं इसलिए यहाँ नहीं लिख रहा क्योंकि ये बात देश का हर इंसान जानता है और दूसरे वो घटिया बात यहाँ लिखना एक शहीद का अपमान होगा।


हम उन सीएम साहब को कितना भी कोस लें लेकिन उन्होंने अपना मकसद हल कर ही लिया। उनके बयान से जो हमारे सुरक्षा बलों का मनोबल गिरा है वह किसी भी मार्क्सवादी और मुसलमान के लिए हर्ष का विषय है। आप इन महाशय को कितनी भी गालियाँ दे दीजिए लेकिन वह अपने राष्ट्र विरोधी एजेण्डे में सफल हो ही गए। इस पर कोई विचार नहीं करता। क्योंकि 1000 साल की ग़ुलामी के बाद हिन्दू में तार्किक शक्ति का इतना ह्रास हो चुका है कि उसे छिपी हुई बातें समझ में ही नहीं आतीं।

ज़रा सोचिए। हमारे सैन्य बलों ने जहाँ 1965, 1971 और 1999 में मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध किया वहीं 1962 में जंग के मैदान में कम्युनिस्ट चीन से टक्कर ली। ऐसे में देश के मुसलमानों और कम्युनिस्टों की आँखों को हमारे जवान और हमारी सैन्य शक्ति खटकने लगी। मुसलमान ने कश्मीर में सैन्य बलों को निशाना बनाया तो कम्युनिस्टों ने नक्सलवादियों को प्रशिक्षित करके अपनी विचारधारा को आकार देने का प्रयास किया। फिर दोनों समुदाय मिलकर शहीदों के बलिदानों को झुठलाने या फिर येन केन प्रकारेण छोटा बताने पर तुल गए। आज स्थिति खतरनाक है दिल्ली का इमाम मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत को खाक करने की कोशिश कर रहा है तो केरल का मुख्यमन्त्री मेजर सन्दीप को अपमानित कर रहा है। वहीं मीडिया में बैठे मुसलमान और कम्युनिस्ट साध्वी और कर्नल पुरोहित को हिन्दू आतंकवादी बता कर हिन्दुत्व और सैन्यबलों पर वैचारिक प्रहार कर रहे हैं।


समय समझने और सम्भलने का है। और मामुओं यानी मार्क्सवादी और मुसलमानों को देश से ठीक वैसे ही खदेड़ने का जैसे श्री उन्नीकृष्णन ने अच्युतानन्दन को अपने घर खदेड़ा था।

वन्देमातरम्

शनिवार, 29 नवंबर 2008

फिर हँसे अल्लाह के बन्दे

हम नहीं रुकेंगे, मुम्बई नहीं डरेगी, आतंकवाद के मुँह पर तमाचा जड़ेंगे और भी न जाने क्या क्या। आप कहते रहिए जो कहना है, करने वाले अपना काम कर गए। बीस से तीस साल के कुछ जवान मुसलमानों ने पूरे शहर को सच्चे इस्लाम की परिभाषा समझा दी। जगह जगह लगे सीसीटीवी कैमरों से ली गईं तस्वीरों स्पष्ट है कि ये इस्लाम के सैनिक हँसते हँसते अपने मज़हब की राह में फ़िदा होने आए थे।

पर हमने तो ये कसम खा रखी है कि हम नहीं सुधरेंगे। इस ग़द्दार क़ौम के साथ एकता और सद्भाव फैलाएँगे। और जैसा चल रहा है वैसा चलता रहेगा। फिर कल आतंकवादी हमला होगा फिर कुछ निर्दोष हिन्दू मारे जाएँगे, फिर से राष्ट्र के नाम प्रधानमन्त्री का मरियल सन्देश आएगा, फिर से शहीदों की याद में कुछ मोमबत्तियाँ जलेंगी और हम एक बार फिर एक नए हमले का इंतज़ार करने लगेंगे। सच्चा मुसलमान (अर्थात् धोखेबाज़ नागरिक) भी घड़ियाली आँसू बहाकर कर फिर ऐसे ही नए कुकृत्य के लिए असला जमा करने लग जाएगा। फिर से हमला होगा और इसी घटनाक्रम की पुनरावृति होती रहेगी।

अब समय किसी पर दोष मढ़ने का नहीं बल्कि राष्ट्र के असली शत्रु को पहचानने का है। ग़द्दारी और आतंकवाद तो मुसलमान की फ़ितरत है ही। वो कहाँ चुप बैठने वाला है? पर बहुसंख्यक होने के बावजूद यदि तुम उसे चुप न करा पाओ तो यह तुम्हारी कमी है। नृशंसता और पशुता तो मुहम्मद द्वारा सिखाई ही गई है पर तुम यदि ऐसे लोगों को भजन सुनाओ तो वो तुम्हारी मूर्खता है।

सच्चाई तो यह है कि अल्लाह के बन्दे एक बार फिर हँसे है और क़ुरआन के अनुसार उन्हें जन्नत मिलना तय है। आख़िर 186 काफ़िरों को मौत के घाट उतारने के बाद तो अल्लाह ने इन्हें इतना सबाब दिया होगा कि इनकी आने वाली पीढ़ियों को भी जन्नत का पासपोर्ट मिल जाएगा।

बस रोई है तो केवल भारत माता। रोए हैं तो हमारे तमाम हिन्दू भाई जो बिना बात के इस्लाम की बलि चढ़ गए। क्या तुम्हें इनका क्रंदन नहीं सुनाई देता। अगर नहीं तो तुमसे बड़ा नपुंसक इस पूरे विश्व में नहीं है। तुम ऐसे ही यदि सेक्युलर बनते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब यह ऐसा ही नंगा नाच पूरे देश में दिखाएँगे। रसूल और अल्लाह की शिक्षा ऐसे ही फैलाएँगे। तुमने इस तथ्य को अभी भी नकारा तो ध्यान रखो अन्त समीप है।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

आत्मदया नहीं आक्रोश पालो!!

देशभक्त पाठकों,

आपकी टिप्पणियाँ एवं पत्र मुझे बड़ी संख्या में प्राप्त हो रहे हैं। कुछ में प्रशंसा व्यक्त की गई है जबकि अन्य में सुझाव हैं। एक सज्जन ने मुझे सलाह दी है कि मैं इस ब्लॉग पर हिन्दुओं के विरुद्ध हो रहे मुसलमानों के अत्याचार और ज्यादतियों के आँकड़े भी दूँ। मैं इसके लिए उन्हें धन्यवाद देता हूँ। साथ ही साथ मैं उनसे क्षमा भी माँगता हूँ क्योंकि मैं अपने इस हिन्दू बन्धु की इस सलाह को मानने में सर्वथा असमर्थ हूँ।

मैं और मुझ जैसे तमाम हिन्दू ये जानते हैं कि मुसलमानों ने हमारे लोगों और हमारी मातृभूमि पर कितना अत्याचार किया है। किस तरह इन बर्बर भेड़ियों ने कश्मीरी पण्डितों पर ज़ुल्म ढाए और उन्हें उनकी पितृभूमि से वञ्चित कर दिया। कैसे 1947 में इस क़ौम और गाँधी की दुरभि सन्धि से हमारी पवित्र भूमि के टुकड़े कर दिए गए।

पर मैंने इन तथ्यों का सहारा न तो कभी लिया न कभी लूँगा। क्यों? क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि इन तथ्यों से हमारे लोगों में केवल आत्मदया का ही संचार होगा। इतिहास में या वर्तमान में हो रहे अत्याचारों से केवल जुगुप्सा ही पैदा होगी जिससे हमारे लोगों में इस्लाम का डर और मज़बूत हो जाएगा।

क्रान्ति को तो वीर रस की ज़रूरत होती है। इसलिए हमें जो परिस्थिति, जो तथ्य आत्मदया का बोध कराए उससे दूर रहना और सम्भव हो तो मिटा देना ही अच्छा है। हिन्दुओं का क़त्ले-आम, नृशंस मुसलमानों द्वारा देश की दुर्दशा और इसी तरह के अन्य विलाप मैंने बहुत बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्रों में पढ़े हैं। पर इन से न तो हिन्दुत्व का भला हुआ न ही देश का। क्रान्ति का संचार होना तो बहुत दूर की बात है।

यदि हमें इस क़ौम को अपने देश से बाहर खदेड़ना है तो हमें उन्हीं उदाहरणों को याद रखना होगा जिसपर आम हिन्दू गौरव कर सके। क्योंकि क्रन्दन से तो दुख पैदा होता है और दुख से शोक की उत्पत्ति होती है। और शोकाकुल रहने वाले लोगों से किसी वीरता की उम्मीद रखना मूर्खता है। आत्मदया से पीड़ित व्यक्ति हिन्दू राष्ट्र जैसे महान् उद्देश्य के लिए असमर्थ ही नहीं बहुत बड़ा ख़तरा भी है। यह व्यक्ति तो एक बीमार सैनिक की भाँति है जो जंग के मैदान में चार सैनिकों के कंधे पर चढ़ कर अस्पताल आता है।

आत्मदया आदमी की भावनाएँ कुछ समय के लिए उद्वेलित करती है पर उसके बात जैसे-जैसे व्यक्ति तथ्य भूलता जाता है उसका उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे उसकी नपुंकता उस पर हावी हो जाती है और वह शान्त होकर सर्वधर्म समभाव जैसी कायरतापूर्ण बातें करने लग जाता है।

इसीलिए हे हिन्दू वीरों! याद रखो उस शिवाजी को जिसने मुसलमान औरंगज़ेब को उसके जीते जी अल्लाह के दर्शन कराए थे। याद करो 6 दिसम्बर 1992 को जब कुछ एक ठोकरों ने बाबरी मसजिद को मटियामेट कर दिया था। 2002 में गुजरात में कारसेवकों की निर्मम हत्या का बदला किस तरह लिया गया था। ये कुछ वाक़ये हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं। हम पर, या हमारी क़ौम पर यदि कोई अत्याचार हो रहा है तो उसके लिए हम और हमारी कायरता ही ज़िम्मेदार है। बहुसंख्यक के ऊपर यदि कोई ज़ुल्म हो रहा है तो वह प्रकाशित करने की बात नहीं बल्कि साम्प्रदायिक शर्म है और कुछ नहीं।

ईमेल सम्पर्क: matribhoomibharat@gmail.com

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

भावनाओं में मत बहो, तर्क से सोचो

देशप्रेमियों!!

आप सबकी जो टिप्पणियाँ और ईमेल मुझे प्राप्त हुए मैं उनका धन्यवाद देता हूँ। साथ ही साथ नए आलेखों के नित्य न जोड़े जाने से मुझे कई पाठकों से शिकायती पत्र भी प्राप्त हुए। हे सुधी पाठकों मैं क्षमाप्रार्थी हूँ जो इतने दिनों आपसे और इस ब्लॉग से दूर रहा। असल में मैंने सोचा कि लेखनी को थोड़ा विराम दिया जाए और थोड़ा गम्भीर मनन व चिन्तन किया जाए।

कल टीवी पर एक फ़िल्म आ रही थी। इसमें एक नायक एक मुसलमान से बड़े ही आक्रामक ढंग से पूछता है- कि ये हिन्दू का ख़ून, ये मुसलमान का ख़ून (मिलाकर) अब बता कौन सा खून हिन्दू का है, कौन सा मुसलमान का?
स्पष्ट है यह एक सेक्युलरवादी प्रपञ्च है जिसका प्रयोग तमाम मुसलमान और मार्क्सवादी हमारे हिन्दू भाइयों यानी राष्ट्रवादियों को भरमाने के लिए करते रहते हैं।
ये लोग चाहते हैं कि राष्ट्रनिष्ठ लोग इन्हीं की तरह ग़द्दार हो जाएँ और देश की अस्मिता को हरे लाल एजेण्डे से कलंकित करें। और मुझे दु:ख तो तब होता है जब लोग इनके झाँसे में आ जाते हैं। क्योंकि विशाल जनसमूह के पास सोचन समझने की शक्ति अत्यन्त न्यून होती है। वो बात को समझने के लिए तर्क की बजाय भावनाओं का सहारा लेता है और इसी बात की प्रतीक्षा ज़हरीले मुसलमानों और कम्युनिस्टों को सदैव रहती है।

अब मैं बताता हूँ कि हिन्दू और मुसलमान के ख़ून में क्या फ़र्क है। कहा गया है-

काक: कृष्ण: पिक: कृष्ण: कोभेद: पिककाकयो:।
वसन्तकाले सम्प्राप्ते काक: काक: पिक: पिक:।।

जैसे कौआ और कोयल दोनों काले होते हैं और इनमें भेद करना बड़ा मुश्किल होता है पर वसन्त ऋतु के आते ही जब कोयल मधुर गाती है और कौआ काँय काँय करता है तो असलियत का पता चल जाता है।

ऐसे ही जब जब देश में विषम परिस्थितियाँ आती हैं तब तब मुसलमान अपने रक्त का असली रंग दिखा देते हैं। चाहे 1947 का बँटवारा हो या फिर देश में बढ़ रहा आतंकवाद। सारे मुसलमान समवेत सुर में राष्ट्र का विरोध करने लगते हैं। इमाम दहाड़ते हैं। मुसलमान इंजीनियर बम बनाते हैं और अशिक्षित वर्ग बम रखता है या फिर दंगे करता है। हिन्दू सीमा पर लड़ता है तो कभी सच्चे मुसलमानों के साथ एनकाउण्टर में शहीद होता है।

हमारे और उनके ख़ून की फ़ितरत में फ़र्क है जो सामान्य रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती पर जब जब थोड़ा अव्यवस्था का माहौल पनपता है मुसलमानों के रक्त में पड़े ग़द्दारी के बीजों को खाद पानी मिल जाता है और फिर वो अंकुरित हो उठते हैं। फिर मदरसों में पढ़ने के बाद इसलाम की पौध तैयार होती है जो अल-क़ायदा और कई ऐसे ही नुक्ते वाले संगठनों की धन वर्षा के बाद देशद्रोह की फ़सल बन कर में लहलहा उठती है।

इसलिए देशभक्तों राष्ट्रभक्ति के मार्ग से कभी न भटको, सेक्युलरवादियों के प्रपंच से भावावेग द्वारा नहीं तर्क से निपटो।

आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा रहेगी। आप ईमेल पर भी सम्पर्क कर सकते हैं।
पता है: matribhoomibharat@gmail.com

भारत माता की जय!!

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

भारतीयता एक वरदान

अब मुझे यह सिद्ध करने की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं कि इसलाम और मार्क्सवाद इस देश के दो सबसे बड़े ख़तरे हैं। ये दोनों ही समुदाय अपनी कलुषित मानसिकता और विषाक्त विचारों से समाज को दूषित करने का घोर प्रयत्न निरन्तर करते रहते हैं। यह लोग हमेशा सच्चे राष्ट्रप्रेमियों को उनके मार्ग से डिगाने का भी प्रयास करते रहते हैं। इन लोगों में तार्किक शक्ति का सर्वथा अभाव रहता है। विचारों का कोई आधार नहीं होता। हो भी कैसे? देश की नींव खोदना जिनका लक्ष्य हो उनके विचार का आधार ढूँढना मूर्खता ही कहा जाएगा। और इनका साथ देने वाले सेक्युलरवादी तो इतने घाघ हैं कि तार्किक स्तर पर पिटने के बाद भोलेपन का चोगा ओढ़ लेते हैं।

वाद विवाद में जब यह सिद्ध हो जाता है कि हर सच्चा मुसलमान सच्चा राष्ट्रद्रोही है तो बेचारे सेक्युलरवादी बचने का कोई रास्ता न देखकर हम जैसे राष्ट्रवादियों से ये पूछते हैं कि अगर आप ही किसी मुसलमान के घर पैदा हो जाते तो क्या होता?
आमतौर पर कोई भी देशभक्त इस प्रश्न पर भड़क उठता है। पर मैंने जब यह प्रश्न अपने आप से पूछा तो जो उत्तर आया उसने मुझमें नई ऊर्जा और नए वैचारिक प्रकाश का संचार किया। अपना यही अनुभव मैं आप सब देश प्रेमियों के साथ बाँटना चाहता हूँ।

मैंने पाया कि हमारा भारतीय होना या हिन्दू होना भाग्यवश नहीं। भारतीयता हमारे लिए विधाता का एक वरदान है। हम जानते हैं कि प्रकृति सर्वश्रेष्ठ को चुन लेती है और इसी परम पूजनीया वसुन्धरा -जिसे हम भारत माता कहते हैं- के लिए ही उसने हमारा चयन किया है। हमें जन्मना हिन्दू बनाकर जो उपकार हमारी मातृभूमि ने हम पर किया है उससे कभी भी उऋण नहीं हुआ जा सकता। यह हमारे कई जन्मों की तपस्या का फल है।

इसीलिए हमारी सारी भावनाएँ तो इसी धरती से जुड़ी हैं। हमारा मन तो इसी पवित्रतम भूमि के प्रति कृतज्ञता में सराबोर है। हमारा रोम रोम इस धरा से उपकृत है। हम मानते हैं कि हमारा शरीर इसी मिट्टी से बना है। हम अरबी, तुर्क, फ़ारसी या ऐसी ही किसी म्लेच्छ जाति के वंशज भी नहीं। हमारा रक्त शुद्ध है। तो राष्ट्रभक्तों!! हम किसी ऐसी कौम में कैसे जा सकते थे जो मातृभूमि के विरुद्ध बारूद इकट्ठा करने में लगी है। हम कैसे किसी मुसलमान के घर पैदा हो सकते थे? अपनी आस्था के लिए साऊदी अरब की ओर कैसे झुक सकते थे? राष्ट्रगीत की अवमानना करने वाली गद्दार कौम में कैसे शामिल हो सकते थे? कैसे हम देश की जड़ें खोदने वाले लोगों के यहाँ जा सकते थे?

इसलिए हे हिन्दुओं अपने धर्म का सम्मान और देश पर गर्व तुम्हारा अधिकार ही नहीं कर्तव्य भी है। क्योंकि एक दिन यही पवित्र विचार हमारी मातृभूमि को इसलाम के कलंक से मुक्ति प्रदान करेंगे।


वन्देमातरम्।

गुरुवार, 6 नवंबर 2008

मीडिया का सच

राष्ट्रभक्तों,

आज कुछ लोगों को मैंने दबी आवाज़ में साध्वी और ले. कर्नल श्रीकान्त की प्रशंसा करते सुना। सुनकर एक हर्षानुभूति हुई। थोड़ी आशा का संचार हुआ। हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का दृढ़ संकल्प कुछ और पक्का हुआ। और लगने लगा कि अब धर्म निरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव जैसी विषैली भावनाओं का अन्त भी समीप आ गया है। देर से ही सही पर यह बात हमारे हिन्दू भाइयों की बुद्धि में आई तो। नहीं तो बेचारे गाँधी के पाखण्ड को ही सच माने बैठे थे।

फिर भी इन मीडिया वालों को समझ नहीं आई। आए भी तो कैसे? लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की नींव खोदने का बीड़ा भी तो देश की ज़ड़ें खोदने वाले सच्चे मुसलमानों ने उठा रखा है। इसलिए ये हमेशा तत्पर रहते हैं कि किसी तरह सही ख़बर को आम आदमी से दूर रख सकें। थोड़ा सा तोड़ मरोड़ कर पेश कर सकें ताकि विश्व का नज़र में हमारे सनातन धर्म को घसीट कर अपनी आतंकवादी क़ौम के स्तर पर ला सकें। जी हाँ मै सच कहता हूँ।

क्या आप लोग जानते हैं कि जो आतिफ़ आमीन नामक सच्चा मुसलमान 19 सितम्बर 2008 को जामिया नगर मुठभेड़ में मारा गया था उसका सगा भाई राग़िब आमीन न्यूज़ एक्स (आईएनएक्स ग्रुप) में सीनियर कैमरामैन है? वो कितना ज़हर फैला सकता है हमारे देश के प्रति क्या आपने कभी सोचा है?

कभी आपका ख़ून खौला जब ये मीडियाकर्मी आरोपी साध्वी को ‘उस’ और ‘इस’ जैसे सर्वनामों से अपमानित करते हैं? और तो और ये लोग दाऊद और अबू सलेम जैसे घोषित अपराधियों के नामों को बड़े आदर के साथ लेते हैं।

देर बहुत हो चुकी है। अब तो समझ जाइए। मैं जानता हूँ कि हमारे लोग जागने लगे हैं। हमारी सेना जागने लगी है। हमारी सोच जागने लगी है। हमारी चेतना जागने लगी है। अत: समय नष्ट करने की बजाय एक झटके में अपनी आँखों पर बँधी समानता और सौहर्द्र की पट्टी उखाड़ फेंको तभी हमारा विश्व विजय का निश्चय, हिन्दू राष्ट्र का संकल्प सिद्ध हो पाएगा।

भारत माता की जय!!

मेल करें: matribhoomibharat@gmail.com

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद की प्रवर्तक साध्वी प्रज्ञा

साध्वी प्रज्ञा का लाई डिटेक्टर टेस्ट हुआ। तीन दिन चले इस टेस्ट में पुलिस को हाथ लगी तो केवल नाकामी। मीडिया में बैठे तमाम सेक्युलरवादियों ने खबर चलाई कि ये साध्वी का सम्मोहन था। वह शायद तंत्र मंत्र जानती है। वह शायद जादू टोना करती हैं। इसीलिए तो अपना ‘जुर्म’ नहीं कुबूला। अरे साध्वी जी आपने क्यों नहीं कहा कि बम विस्फोट आपने ही करवाया था। देखिए बेचारे कितने अमर सिंह, लालू यादव, राम विलास पासवान, शरद पवारों की भावनाएँ आहत हुईं। कितने तौक़ीर, असलम, इस्माइल, अली, मुहम्मद, यूसुफ़, यूनिस, अकरम चकरमों के चेहरे जो अब तक ख़ुशी से चमक रहे थे आज मायूस हैं। आप क्यों नहीं समझती कि आपके इस रवैये से इसलाम ख़तरे में आ गया है?भई हमें तो यही सीख मिली है अपने गुरुजनों से, माता पिता से कि अगर तुम्हारे साँस लेने से भी मुसलमान को अगर दिक्कत हो तो थोड़ी देर रुक जाओ। सालों से हमें जो एकता और सौहार्द्र की घुट्टी पिलाई गई है ये उसी का नतीजा है। इन देशद्रोहियों के लिए प्यार पनपाने के लिए हमारे घरों में जो सीख दी जाती है उसी की वजह से हम इस क्रान्तिकारी साध्वी की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करने में अक्षम हैं। धर्म निरपेक्ष दल, साम्यवादी और देशद्रोही मुसलमान हर तरह का प्रपंच कर रहे हैं किस क्रान्ति को हिन्दू आतंकवाद का नाम देकर हमारे धर्म को इतिहास में कलंकित कर दें।

हिन्दू संगठन किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। भाजपा भी गद्दारों के वोट पाने के लिए कुछ भी नहीं बोल रही। हिन्दू राष्ट्र के लिए कार्यरत होने का दावा करने वाला संघ भी इस मामले से पल्ला झाड़ रहा है। न तो पुलिस हमारे लिए है, न ही कोई राजनीतिक दल, न मीडिया। ऐसी स्थिति में एक ही विकल्प बचता है। स्वयम् अपनी रक्षा करें। अपने देश की रक्षा करें। अपने समाज की रक्षा करें। यह विद्रोह नहीं आत्मरक्षा हेतु महायज्ञ है। इसमें अगर अपना सर्वस्व भी होम करना पड़े तो करो।
चाहे जहाँ भी हो वहाँ कोशिश करो हिन्दुत्व के प्रचार प्रसार की। इसलाम के विनाश की। हिन्दुओं में एकता की, सद्भाव की। तभी हम इस देशद्रोह की महफ़िल को मातम में बदलने में कामयाब हो पाएँगे। भारत माता की जय!!

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

आतंकवाद नहीं आपद्धर्म है

मालेगाँव बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ़्तारी हुई, सेक्युलरवादियों की जान में जान आई, हिन्दुत्व को कोसने का एक बहाना मिल गया। हमारी सरकार को भी पहले ‘हिन्दू’ आतंकवादी को पकड़ कर एक गर्व की अनुभूति हुई। कथित बुद्धिजीवी और देशद्रोह को जनवाद व प्रगतिवाद नामों से अलंकृत करने वाले मार्क्सवादियों को मानो हिन्दुत्व घृणा प्रचार हेतु प्राणवायु मिल गई।

पर यह कैसे सम्भव है कि कोई हिन्दू आतंकवादी हो? अगर हिन्दू आतंकवादी होता तो हिन्दू हिन्दू न रहता। मुसलमान कहलाया जाता। मैं बताता हूँ क्यों। मुसलमानों के पास तो विकल्प है कि वो अपने 52 देशों में से किसी भी देश को चुन सकते हैं। उससे वफ़ादरी निभा सकते हैं। सऊदी अरब की तरफ़ नमाज़ के वक़्त सजदा कर सकते हैं। पर हम हिन्दू कहाँ जाएँगे? हमारा जीवन, हमारी मृत्यु, हमारी आस्था, हमारी गरिमा, हमारा स्वाभिमान, हमारा सम्मान, हमारा यश, हमारी कीर्ति, हमारा शरीर, हमारा मन, हमारी आत्मा, हमारा सर्वस्व सब इसी परम पावन मातृभूमि के साथ जुड़ा है। तो ऐसे में यह कैसे हो सकता है कि कोई हिन्दू अपने ही देश में डर और अव्यवस्था फैलाए।

तो देशप्रेमियों मैं बताता हूँ। ये क्रिया की प्रतिक्रिया है, जैसे को तैसा, नहले पर दहला, ईंट का जवाब पत्थर से। ये आतंकवाद नहीं है प्रतिक्रियावाद है। इस देश के साथ पिछले 1000 वर्षों से मुसलमानों ने जो किया और करते जा रहे हैं ये उसका ही एक प्रतिफल है। ये आतंकवाद नहीं क्रान्ति का आह्वान है, महासंग्राम का शंखनाद है जो एक नारी ने किया है।

थोड़ा सोचिए! सैकड़ों तौकीर, अबू बशर, सलीम, अंसार, इफ़्तेख़ार, अफ़ज़ल हमारे बीच आज भी मज़े से घूम रहे हैं। हमारे निर्दोष लोगों को मार रहे हैं, अपंग बना रहे हैं। सरकार इनको पकड़ने की बजाय इनके सामने षाष्टांग प्रणाम कर रही है। हम क्या करें? हथियार उठाने के अलावा कोई और रास्ता बचता है क्या? साध्वी ने जो किया प्रतिक्रियावाद था। मैं तो कहूँगा आपद्धर्म है। यानी विपदा के समय अपनाया जाने वाला धर्म। हम सबको, पूरी कौम को यही धर्म अपनाना पड़ेगा। तभी हम इन देशद्रोहियों से पार पाने में सफल होंगे।

मेल सम्पर्क: matribhoomibharat@gmail.com