शनिवार, 25 अप्रैल 2009

साँईं बाबा: धार्मिक पाखण्ड का दूसरा नाम

देशभक्तों,

हमेशा ही हमारी हिन्दू कौम भोली रही हो ऐसा नहीं है। हिन्दू इतना स्वार्थी भी है कि अपने जरा से स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी को भी भगवान मान सकता है। किसी किसी कीभी आराधना शुरू कर सकता है। किसी भी ऐरे गैरे के प्रति अपनी आस्था प्रकट कर सकता है। ऐसे में उसे देश हित, धर्म हित की कोई चिन्ता नहीं रहती। वह अपने मतलब के लिए किसी को भी सन्त मान कर भगवान बना सकता है।

कोई जरा सा चमत्कार क्या दिखा दे वह भगवान माना जाने लगता है। आधुनिक काल में लोगोंने साँईं बाबा को ही भगवान मान लिया। और साँईं के जीवन काल से लेकर आज तक उनकी दुकानबहुत बढ़िया चल रही है। अगर को हममें से कोई कहे कि मेरे घर की घरती पर कोई कदम रखेगा तो उसके दुख दर्द दूर हो जाएँगे, दुखियों के दुख मेरे घर की सीढ़ी पर पाँव रखते ही मिट जाएँगे और मरने के बाद भी मैं अपनी कब्र से क्रियाशील रहूँगा तो आप और हम सब हिन्दू उसे पाखण्ड मानेंगे। पर साँईं बाबा के इस पाखण्ड को सबने मान लिया और कुछ धर्मद्रोहियों ने तो उन्हें शिव और दत्तात्रेय का अवतार तक बना डाला। एक ऐसे व्यक्ति को बिठा कर मन्दिरों को भ्रष्ट जैसा जघन्य अपराध करने में लग गए। हम जानते हैं कि साँईं बाबा के माता पिता और उन्के जन्म का किसी को नहीं पता। साँईं ने पहले अपनी मार्केटिंग की, भक्त बनाए फिर भक्तों ने बाबा की मार्केटिंग की और बाबा सन्त से भगवान बना दिए गए।

अत: हे हिन्दुओं इस दिमागी दिवालिएपन और वैचारिक घटियापन से ऊपर उठो। देश को तुम्हारी आवश्यकता है। अगर कोई देवी है, कोई भगवान है तो वो सिर्फ़ भारत माता है। तुम्हें समय समय पर नए नए भगवानों की आवश्यकता रहती है पर उस देवी के प्रति कोई श्रद्धा नहीं कोई कृतज्ञता नहीं जो तुम्हें पीने के लिए पानी और साँस लेने के लिए हवा प्रदान करती है। ऐसी जीवनदायिनी माता को याद कर लो मुक्ति निश्चित है। किसी साँई और किसी बाबा की फिर कोई ज़रूरत नहीं।

भारत माता की जय!

सोमवार, 30 मार्च 2009

हिन्दू हित या स्वार्थसिद्धि?

देशप्रेमियों,

आज देश भर में वरुण गाँधी के बयान पर बवाल हो रहा है। कई लोगों की भावनाएँ आहत हुई हैं तो कई हिन्दू वरुण को हिन्दुओं का मसीहा मानने लगे हैं। पर इसे हिन्दू धर्म का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हर नेता हिन्दू और उसकी भावनाओं का लाभ उठाना चाहता है। ऐसे में वरुण गाँधी जैसे ओछे रानेताओं की मंशा क्या होती है, मैं बताता हूँ।

क्या आप जानते हैं कौन हैं ये वरुण गाँधी? सिवाय इसके कि ये भी नेहरू गाँधी परिवार के कुलदीपक हैं। हम भी नहीं जानते। कौन हैं कहाँ से आए और क्यों भाजपा में इतनी सम्मान से लाए गए और तो और काडर की बात करने वाले आरएसएस की नागपुर बैठक मंच पर बैठाए गए? क्या वर्ष 2004 में अपनी माँ के चुनाव प्रचार और 2009 में पीलीभीत के अलावा बीच में आपने कभी इन्हें देखा? आप तो खुश हो गए उन्होंने गालियाँ दे दीं और वो भी निहायत ही घटिया लहजे में, घटिया भाषा का प्रयोग किया और सही मायने में अपने घर से मिले संस्कार दिखा दिए। जिस भाषण शैली का उन्होंने प्रयोग किया वो किसी प्रबुद्ध, संस्कारी हिन्दू की थी ही नहीं।




सच तो ये है कि वरुण जैसे नेता देश या धर्म की नहीं सोचते अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। देशद्रोह, गद्दारी और हिंसा तो मुसलमानों के रक्त में व्याप्त है वो अपने नैसर्गिक गुणों को नहीं त्याग सकता। ये तो अल्लाह का नूर है जो मुहम्मद के मुख से टपका है और मुसलमान उसे बटोर बटोर कर इंसानों तक पहुँचा रहे हैं। आतंकवाद एक आम मुसलमान का फुल टाइम जॉब है पर वरुण जैसे नेताओं को इसका ध्यान केवल चुनावी मौसम में आता है। तब कहाँ थे वरुण गाँधी जब 13 मई 2008 को जयपुर घायल हुआ था, अहमदाबाद में हिन्दू मरा था और बेंगलुरु रोया था? क्या उन्हें 13 सितम्बर को दिल्ली का क्रन्दन नहीं सुनाई दिया। तब इसलाम ने पशुता की सारी सीमाएँ लाँघ डाली थीं और वरुण गाँधी कहीं नहीं थे। वरुण तो वरुण हिन्दुत्व के महानायक नरेंद्र मोदी क्या कर रहे थे?

सच तो ये है कि जिसे तुमने तारणहार माना, जिससे आशा की उसी से धोखा मिला। पर अब समय है सोचने का और जानने का और वरुण जैसे स्वार्थी नेताओं की राजनीति को न चलने देने का। क्योंकि इससे नुकसान देशद्रोहियों को नहीं स्वयम् हिन्दुओं को है। हमारी लड़ाई मुसलमानों के विरुद्ध नहीं इसलाम के विरुद्ध है क्योंकि इसलाम देश का नासूर बन चुका है। साथ ही साथ वरुण जैसे नेताओं को भी समझा देना है कि हिन्दू किसी के हाथ की कठपुतली नहीं न ही वो वोट बैंक है। वो भारत माता का सच्चा सपूत है। जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए स्वयमेव सक्षम है। उसे वरुण गाँधी जैसे किसी विधर्मी की ज़रूरत नहीं

भारत माता की जय!

शनिवार, 3 जनवरी 2009

नया तंत्र नई व्यवस्था

इस राष्ट्र के जनतन्त्र घोषित होने के बाद कई राजनीतिक दलों ने जनता के माध्यम से अपना उल्लू सीधा करने के लिए जनसाधारण की अल्पबुद्धि को ही अपना हथियार बनाना उचित समझा। अपने अपने ढंग से वायदे. कायदे समझाए गए और सत्ता प्राप्ति के प्रयास निर्लज्जता से किए जाने लगे। गरीबी हटाओ से लेकर हिन्दुत्व लाओ तक कई मुद्दे लाए गए पर खेद के साथ कहना पड़ता है कि न तो ग़रीबी गई न हिन्दुत्व आया। सत्तालोलुप नेताओं के लिए पहले आलेखों में भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसलिए उनके चरित्र का वर्णन पुन: करना निरर्थक है।

हर साधारण व्यक्ति यह जानता है कि देश के नेता जिस गति से राष्ट्र को पतन की ओर ले जा रहे हैं उसके परिणाम क्या होंगे। फिर भी वह विवश है। क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं। वो सिर्फ़ ये कहके संतोष कर लेने पर मजबूर है कि सब चोर हैं और जो चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा। आम आदमी परिस्थितियों में परिवर्तन की आशा लगभग छोड़ चुका है। पेज थ्री के लोग यानी आचार विचार रहित जनता जो देश की जनसंख्या का मात्र 6% ही है, मौज काट रही है। मुसलमान और मार्क्सवादी देशद्रोह के नए नए आयाम तलाशने में जुटे हैं और प्रतिदिन नीचता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

पर स्थिति को बदलना होगा। परिस्थितियों में परिवर्तन आवश्यक है। और ये सब कैसे होगा मैं बताता हूँ।

आज भारत माता के इस मुश्किल वक्त में जहाँ हमें 16 करोड़ आईएसआई के एजेण्टों अर्थात् सच्चे मुसलमानों के बीच रहना पड़ रहा है वहीं ग़द्दार साम्यवादियों को झेलना हम सबकी मजबूरी है। देश को सेक्युलरवादियों से भी ख़तरा है पर परिस्थितिवश हमें इनके साथ रहना ही पड़ता है। स्थिति जटिल अवश्य है पर अपरिवर्तनीय नहीं। इसको बदलने के लिए हम सबको आगे आना होगा। और हमें किसी भी कुर्सी का मोह त्यागना होगा। लड़ाई सत्ता के लिए नहीं अपितु विचारधारा के लिए लड़ी जाएगी, देशहित के लिए लड़ी जाएगी। जंग देश के तमाम आत्महत्या करने पर मजबूर किसानों के लिए होगी, उन जवानों के लिए होगी जो देश के लिए बलिदान देने को तत्पर रहते हैं। उस सरकारी कर्मचारी के लिए होगी जो जीवन भर कलम घिसता रहता है और पीएफ़ की दरें बढ़ने पर ही खुश हो जाता है।

राष्ट्रप्रेमियों यदि हम अपने ये मुद्दे जनता को भली भाँति समझा पाए तो सत्ता के लिए किसी संघर्ष की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। हमारे इरादे और हमारे विचार साफ़ हैं। हमें किसी प्रकार की न तो कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है न ही सत्ता की कोई लिप्सा। भले ही सफलता प्राप्ति में हमें थोड़ा समय लगे, थोड़ा संघर्ष करना पड़े पर हम सफल होंगे ही ऐसा मेरा मानना है। बस हमें तर्कसंगत बात को अपनाना है और ये समझ लेना है कि कोई भी कानों को अच्छी लगने वाली बात जो किसी मुसलमान या मार्क्सवादी के मुख से निकली है वो अच्छी नहीं होगी क्योंकि वो अच्छी हो ही नहीं सकती। तब हम अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा पर अटल अडिग रह पाएँगे अन्यथा अन्त निश्चित है।

Email Id: matribhoomibharat@gmail.com

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

शहीद:19 दिसम्बर 1927

16 दिसम्बर 1927 की रात। डीएसपी शफ़ीकुर्रहमान अपनी पत्नी मज़हर्रुन्निसा को एक काग़ज़ देते हैं जिसे लेकर वो सीधे फ़ैज़ाबाद जेल पहुँचती हैं। वो अन्दर जाती हैं और पर्चा जेल में बन्द अपने बेटे को देती हैं। ये पर्चा एक माफ़ीनामा है जिससे उस नौजवान की सज़ा कम हो सकती है। पर वो एक नज़र पर्चे को देखता है फिर अपनी माँ से कहता है-

“इस मुल्क के करोड़ों मुसलमानों में से आज तक कोई भी मादरे वतन के लिए नहीं मिटा। तू भी मुझे रोक रही है”

यह कह कर अश्फ़ाकुल्लाह ख़ान ने पीठ मोड़ ली और काकोरी काण्ड के मुजरिम के तौर पर 19 दिसम्बर 1927 को हँसते हँसते चढ़ गया फाँसी। देश के एक सच्चे सपूत की भाँति। एक सच्चे वीर की तरह

19 दिसम्बर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को भी काकोरी काण्ड मामले में ही गोरखपुर जेल में सूली पे चढ़ा दिया गया। शायद राष्ट्र के प्रति बलिदान देने की जिजीविषा उनमें इतनी थी कि उन्होंने पहले ही लिख दिया था-

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


कहते हैं जो समाज अपने शहीदों को भुला देता है, वीरों के बलिदानों को तिलांजलि दे देता है वो मिट जाता है। और यही शायद हमारे साथ हो रहा है। ठीक तीन महीने पहले जामिया नगर मुठभेड़ हुई थी। उसमें मारे गए देशद्रोहियों की कब्रों पर फातिहे पढ़े गए थे, उनकी मौत से क्षुब्ध होकर ईद नहीं मनाई गई थी। पर अश्फ़ाकुल्लाह जैसे शहीद को श्रद्धञ्जलि देने के लिए किसी इमाम के पास समय नहीं था। क्योंकि अश्फ़ाक़ इस्लाम के लिए नहीं देश के लिए शहीद हुआ था। उसका लक्ष्य सत्ता नहीं देश की मुक्ति था। शायद इसीलिए मुसलमानों की निगाह में वो नायक नहीं, वीर नहीं। क्योंकि इस्लाम की तो शुरुआत मुहम्मद ने मक्के की सत्ता हथियाने के लिए की थी। इसी की शिक्षा उसने दी तभी तो चाहे वो अबू बकर हों, अली हों हों सारे ख़लीफ़े पिछले वाले को मारकर ख़लीफ़ा बने। पर अश्फ़ाक ने तो देशहित में काम किया था। वो देश की कुर्सी के लिए तो लड़ाई ही नहीं कर रहा था फिर मुसलमान उसे कैसे महान् और सच्चा मुसलमान मानते। पर मैं जानता हूँ कि मेरी और मेरे जैसे राष्ट्रवादियों की दृष्टि में अश्फ़ाकुल्लाह ख़ान महान् हैं।


matribhoomibharat@gmail.com

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

बन्द करो सम्मान...., बहुत हुआ सम्मान....

देशभक्तों,

यूँ तो मैं आत्मदया और बुरे अनुभवों के प्रचार के माध्यम से किसी क्रान्ति की अपेक्षा नहीं करता। पर आज, यानी राष्ट्रीय शर्म की सातवीं बरसी पर मन कुछ दुखी था। इसलिए यदि इस आलेख से चित्त थोड़ा खिन्न हो जाए तो आप मुझे क्षमा करेंगे। ऐसी मैं आशा रखता हूँ।

यह एक विडम्बना ही है कि 6 और 13 दिसम्बर ये दोनों ही दिनांक साल में एक ही दिन पड़ती हैं। पहली जहाँ हमें हिन्दू शौर्य का स्मरण कराती है वहीं दूसरी हमारे नेताओं की अकर्मण्यता की याद दिलाती हैं। यहाँ मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा। इन दोनों ही घटनाओं के उत्तरदायी दो व्यक्ति है।

हमारे हिन्दू शूरवीरों ने जिस योजनाबद्ध तरीके से एक राष्ट्रीय कलंक को 6 दिसम्बर 1992 को धोया उस योजना के पीछे दो सत्ता के लालची लोगों का हाथ था। एक ने तो सत्ता का पूर्ण सुख भोग लिया पर दूसरा अभी भी कतार में है। यह व्यक्ति 13 दिसम्बर 2001 की घटना के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है। इस सत्तालोलुप व्यक्ति को आजकल भारत के प्रतीक्षारत प्रधानमन्त्री के नाम से भी जाना जा रहा है। असल में इसने भारत भूमि पर राज करने के लिए हिन्दुत्व का भी जमके सहारा लिया अपना उल्लू सीधा किया पर अब बदले माहौल को देखकर सेक्युलरवाद की राह पकड़ अपनी स्वार्थसिद्धि की कामना कर रखता है।

यदि यह हाल है आदर्शवादी और इमानदार माने जाने वाले नेताओं का तो तमाम सेक्युलरवादियों और अन्य दलों के नेताओं से कोई भी आशा रखना मूर्खता ही है।

पर कभी आपने यह सोचने का कष्ट उठाया कि हर नेता आपकी इच्छाओं, आपके विचारों, आपकी आस्थाओं को कुचलने को क्यों तैयार रहता है?

मैं बताता हूँ। जिस सत्ता को जनसाधारण के लिए विकासशील नीतियाँ बनाने का साधन होना चाहिए था, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए एक माध्यम होना चाहिए था वह सत्ता स्वयम् ही साध्य हो गई।

इसके बाद तो भारतवर्ष के स्वार्थी नेता सत्ता रूपी वारंगना की सुगन्ध पाकर ही एक व्यभिचारी समान आचरण करने लग गए। कइयों के लिए संसद गन्तव्य हो गई तो कुछ ने विधान सभा को ही अपने जीवन का अन्तिम लक्ष्य मान लिया। जो छुटभैये थे वो निगम पार्षद बन कर अपना जीवन सफल समझने लगे, जिनकी महत्वाकांक्षा ऊँची थी वह येन-केन-प्रकारेण मन्त्री बनने के लिए रस्साकशी करने लगे। जो जीता उसने सरकार नाम की नगरवधू का भरपूर आनन्द लिया, जिसकी दाल नहीं गली वह अपना मुँह छिपा कर निकल लिया। हर बार हारी तो सिर्फ़ जनता। हिन्दू के नाम पर वोट देने वाली जनता, विकास की आशा लगाने वाली जनता, ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने वाली जनता, ऐसे स्वार्थी नेताओं के लिए आपस में सिर फोड़ने वाली जनता।

किसी ऐसे व्यक्ति को सत्ता तक ले जाना कहाँ तक उचित है जिसकी विचारधारा समय और परिस्थितियों के साथ बदलती रहे? जो बात करे हिन्दुत्व की और इफ़्तार देशद्रोही मुसलमानों के साथ करे? ऐसे में नेता को बदला जाए या तन्त्र को? या ऐसे विधान और संविधान को जो देशभक्तों और देशद्रोहियों को समान अधिकार देता है?

इस बार टिप्पणी नहीं इस प्रश्न के उत्तर की आशा रहेगी।

Email Id: matribhoomibharat@gmail.com

रविवार, 7 दिसंबर 2008

टिप्पणी पर टिप्पणी

मैं इस ब्लॉग के माध्यम से जहाँ अपनी बातें कई समान विचारधारा रखने वाले लोगों तक पहुँने में सफल हुआ हूँ वहीं कई राष्ट्रद्रोहियों और मूर्ख सेक्युलरवादियों ने दिल खोलकर मेरी निन्दा की है। ऐसे देशद्रोहियों को तिलमिलाते, छटपटाते और कराहते देखने में मुझे और मेरे कई साथियों को हर्ष व गर्व की मिश्रित अनुभूति हुई। एक ऐसे ही भाई हैं आलोक कुमार पाण्डेय जिन्होंने साम्यवाद पर हमारे प्रहारों से विचलित होकर कुछ इस तरह की टिप्पणी दी है-


"आप जैसे पागल लोगों ने इस देश को कत्लोगारत का मैदान बना दिया है।
भगत सिंह ने कहा था सांप्रदायिक होना इंसानियत का दुश्मन होना है ...आप हैं
हिन्दुस्तान किसीके बाप का नहीं है
खदेडा मोदी को करकरे के घरवालों ने भी था उसकी बात क्यों नहीं करते?
लाशों पर सत्ता के महल बनाने वालों के अंत से ही यह देश प्रगति करेगा
और ये होगा ही।"



इस पर भी इन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लीजिए दूसरी टिप्पणी चिपका दी-

"राष्ट्रवाद भी विदेशों में ही जन्मा है ... ये लेखक हिटलर की किताब पढता है और मार्क्सवाद को गाली देता है"


मैं बताता हूँ इसमें ऐसे लोगों की क्या मंशा होती है। असल में इन लोगों के पास कहने को कुछ ठोस होता नहीं क्योंकि इन्होंने बाबा मार्क्स के आगे कुछ सोचा ही नहीं। जो उन्होंने अपनी किताब में लिखा वो इन्होंने कण्ठस्थ कर अपने गर्धवालाप में प्रस्तुत कर दिया। साथ में अपनी इस घटिया बात को भगत सिंह जैसे देशभक्त की बात से भी अलंकृत कर दिया।

इन भाई साहब को यह भी लगता है कि मैंने अपने सारे विचार केवल हिटलर की माइन कैम्फ़ (शायद इसका ये नाम नहीं जानते) पढ़ कर बनाए हैं। कल को यदि आपको मेरे ब्लॉग पर यह सूक्ति पढ़ने को मिले-

“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”

तो राष्ट्रवाद को विदेशी विचारधारा बताने वाले पाणडेय जी के अनुसार मैंने यह भी हिटलर की किताब से उठाई होगी। खैर अब सिद्ध करने या तर्क देने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि कम्युनिस्टों का भेद अपने आप खुल चुका है।

इसलिए हे देशभक्तों!! जनता को रोटी कपड़ा और मकान को अहमियत और राष्ट्रवाद को ताक पर रखने वाली विचारधारा का अन्त समीप है। तुम्हें अपनी ठोकरों से साम्यवाद की गिरती दीवार पर प्रहार करके उसका खात्मा करना है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 16 साल पहले तुमने कुछ देर में ही बाबरी मसजिद को मटियामेट कर दिया था।

ईमेल- matribhoomibharat@gmail.com

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

मार्क्सवाद और इस्लाम- राष्ट्रद्रोह के प्रबल अध्याय

देशप्रेमियों!!

26 से 29 नवंबर तक मुंबई में जो देश ने देखा वो सच्चे इस्लाम का चेहरा था और उसके बाद जो भी कुछ हुआ उसने मार्क्सवाद को बेनक़ाब कर दिया। लोगों ने महसूस किया कि दोनों समुदाय राष्ट्र के प्रति कितनी दुर्भावना रखते हैं। पहले तो अल्लाह के नेक बन्दों ने हमारे 185 निर्दोष लोगों को नृशंसता से मार डाला और फिर उसके अगले ही दिन जब राजनैतिक दबाव में केरल की साम्यवादी सरकार के मुख्यमंत्री मेजर सन्दीप को श्रद्धांजलि देने पहुँचे तो उनके पिता उन्नीकृष्णन द्वारा बाहर खदेड़ दिए गए। इसके बाद खिसिया के उन्होंने जो बयान दिया वह उनकी तुच्छ मानसिकता और ओछी विचारधारा का परिचायक है। उनकी घृणित टिप्पणी मैं इसलिए यहाँ नहीं लिख रहा क्योंकि ये बात देश का हर इंसान जानता है और दूसरे वो घटिया बात यहाँ लिखना एक शहीद का अपमान होगा।


हम उन सीएम साहब को कितना भी कोस लें लेकिन उन्होंने अपना मकसद हल कर ही लिया। उनके बयान से जो हमारे सुरक्षा बलों का मनोबल गिरा है वह किसी भी मार्क्सवादी और मुसलमान के लिए हर्ष का विषय है। आप इन महाशय को कितनी भी गालियाँ दे दीजिए लेकिन वह अपने राष्ट्र विरोधी एजेण्डे में सफल हो ही गए। इस पर कोई विचार नहीं करता। क्योंकि 1000 साल की ग़ुलामी के बाद हिन्दू में तार्किक शक्ति का इतना ह्रास हो चुका है कि उसे छिपी हुई बातें समझ में ही नहीं आतीं।

ज़रा सोचिए। हमारे सैन्य बलों ने जहाँ 1965, 1971 और 1999 में मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध किया वहीं 1962 में जंग के मैदान में कम्युनिस्ट चीन से टक्कर ली। ऐसे में देश के मुसलमानों और कम्युनिस्टों की आँखों को हमारे जवान और हमारी सैन्य शक्ति खटकने लगी। मुसलमान ने कश्मीर में सैन्य बलों को निशाना बनाया तो कम्युनिस्टों ने नक्सलवादियों को प्रशिक्षित करके अपनी विचारधारा को आकार देने का प्रयास किया। फिर दोनों समुदाय मिलकर शहीदों के बलिदानों को झुठलाने या फिर येन केन प्रकारेण छोटा बताने पर तुल गए। आज स्थिति खतरनाक है दिल्ली का इमाम मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत को खाक करने की कोशिश कर रहा है तो केरल का मुख्यमन्त्री मेजर सन्दीप को अपमानित कर रहा है। वहीं मीडिया में बैठे मुसलमान और कम्युनिस्ट साध्वी और कर्नल पुरोहित को हिन्दू आतंकवादी बता कर हिन्दुत्व और सैन्यबलों पर वैचारिक प्रहार कर रहे हैं।


समय समझने और सम्भलने का है। और मामुओं यानी मार्क्सवादी और मुसलमानों को देश से ठीक वैसे ही खदेड़ने का जैसे श्री उन्नीकृष्णन ने अच्युतानन्दन को अपने घर खदेड़ा था।

वन्देमातरम्