बुधवार, 26 नवंबर 2008

आत्मदया नहीं आक्रोश पालो!!

देशभक्त पाठकों,

आपकी टिप्पणियाँ एवं पत्र मुझे बड़ी संख्या में प्राप्त हो रहे हैं। कुछ में प्रशंसा व्यक्त की गई है जबकि अन्य में सुझाव हैं। एक सज्जन ने मुझे सलाह दी है कि मैं इस ब्लॉग पर हिन्दुओं के विरुद्ध हो रहे मुसलमानों के अत्याचार और ज्यादतियों के आँकड़े भी दूँ। मैं इसके लिए उन्हें धन्यवाद देता हूँ। साथ ही साथ मैं उनसे क्षमा भी माँगता हूँ क्योंकि मैं अपने इस हिन्दू बन्धु की इस सलाह को मानने में सर्वथा असमर्थ हूँ।

मैं और मुझ जैसे तमाम हिन्दू ये जानते हैं कि मुसलमानों ने हमारे लोगों और हमारी मातृभूमि पर कितना अत्याचार किया है। किस तरह इन बर्बर भेड़ियों ने कश्मीरी पण्डितों पर ज़ुल्म ढाए और उन्हें उनकी पितृभूमि से वञ्चित कर दिया। कैसे 1947 में इस क़ौम और गाँधी की दुरभि सन्धि से हमारी पवित्र भूमि के टुकड़े कर दिए गए।

पर मैंने इन तथ्यों का सहारा न तो कभी लिया न कभी लूँगा। क्यों? क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि इन तथ्यों से हमारे लोगों में केवल आत्मदया का ही संचार होगा। इतिहास में या वर्तमान में हो रहे अत्याचारों से केवल जुगुप्सा ही पैदा होगी जिससे हमारे लोगों में इस्लाम का डर और मज़बूत हो जाएगा।

क्रान्ति को तो वीर रस की ज़रूरत होती है। इसलिए हमें जो परिस्थिति, जो तथ्य आत्मदया का बोध कराए उससे दूर रहना और सम्भव हो तो मिटा देना ही अच्छा है। हिन्दुओं का क़त्ले-आम, नृशंस मुसलमानों द्वारा देश की दुर्दशा और इसी तरह के अन्य विलाप मैंने बहुत बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्रों में पढ़े हैं। पर इन से न तो हिन्दुत्व का भला हुआ न ही देश का। क्रान्ति का संचार होना तो बहुत दूर की बात है।

यदि हमें इस क़ौम को अपने देश से बाहर खदेड़ना है तो हमें उन्हीं उदाहरणों को याद रखना होगा जिसपर आम हिन्दू गौरव कर सके। क्योंकि क्रन्दन से तो दुख पैदा होता है और दुख से शोक की उत्पत्ति होती है। और शोकाकुल रहने वाले लोगों से किसी वीरता की उम्मीद रखना मूर्खता है। आत्मदया से पीड़ित व्यक्ति हिन्दू राष्ट्र जैसे महान् उद्देश्य के लिए असमर्थ ही नहीं बहुत बड़ा ख़तरा भी है। यह व्यक्ति तो एक बीमार सैनिक की भाँति है जो जंग के मैदान में चार सैनिकों के कंधे पर चढ़ कर अस्पताल आता है।

आत्मदया आदमी की भावनाएँ कुछ समय के लिए उद्वेलित करती है पर उसके बात जैसे-जैसे व्यक्ति तथ्य भूलता जाता है उसका उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे उसकी नपुंकता उस पर हावी हो जाती है और वह शान्त होकर सर्वधर्म समभाव जैसी कायरतापूर्ण बातें करने लग जाता है।

इसीलिए हे हिन्दू वीरों! याद रखो उस शिवाजी को जिसने मुसलमान औरंगज़ेब को उसके जीते जी अल्लाह के दर्शन कराए थे। याद करो 6 दिसम्बर 1992 को जब कुछ एक ठोकरों ने बाबरी मसजिद को मटियामेट कर दिया था। 2002 में गुजरात में कारसेवकों की निर्मम हत्या का बदला किस तरह लिया गया था। ये कुछ वाक़ये हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं। हम पर, या हमारी क़ौम पर यदि कोई अत्याचार हो रहा है तो उसके लिए हम और हमारी कायरता ही ज़िम्मेदार है। बहुसंख्यक के ऊपर यदि कोई ज़ुल्म हो रहा है तो वह प्रकाशित करने की बात नहीं बल्कि साम्प्रदायिक शर्म है और कुछ नहीं।

ईमेल सम्पर्क: matribhoomibharat@gmail.com

1 टिप्पणी:

GJ ने कहा…

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i can't agree with you more

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