शनिवार, 29 नवंबर 2008

फिर हँसे अल्लाह के बन्दे

हम नहीं रुकेंगे, मुम्बई नहीं डरेगी, आतंकवाद के मुँह पर तमाचा जड़ेंगे और भी न जाने क्या क्या। आप कहते रहिए जो कहना है, करने वाले अपना काम कर गए। बीस से तीस साल के कुछ जवान मुसलमानों ने पूरे शहर को सच्चे इस्लाम की परिभाषा समझा दी। जगह जगह लगे सीसीटीवी कैमरों से ली गईं तस्वीरों स्पष्ट है कि ये इस्लाम के सैनिक हँसते हँसते अपने मज़हब की राह में फ़िदा होने आए थे।

पर हमने तो ये कसम खा रखी है कि हम नहीं सुधरेंगे। इस ग़द्दार क़ौम के साथ एकता और सद्भाव फैलाएँगे। और जैसा चल रहा है वैसा चलता रहेगा। फिर कल आतंकवादी हमला होगा फिर कुछ निर्दोष हिन्दू मारे जाएँगे, फिर से राष्ट्र के नाम प्रधानमन्त्री का मरियल सन्देश आएगा, फिर से शहीदों की याद में कुछ मोमबत्तियाँ जलेंगी और हम एक बार फिर एक नए हमले का इंतज़ार करने लगेंगे। सच्चा मुसलमान (अर्थात् धोखेबाज़ नागरिक) भी घड़ियाली आँसू बहाकर कर फिर ऐसे ही नए कुकृत्य के लिए असला जमा करने लग जाएगा। फिर से हमला होगा और इसी घटनाक्रम की पुनरावृति होती रहेगी।

अब समय किसी पर दोष मढ़ने का नहीं बल्कि राष्ट्र के असली शत्रु को पहचानने का है। ग़द्दारी और आतंकवाद तो मुसलमान की फ़ितरत है ही। वो कहाँ चुप बैठने वाला है? पर बहुसंख्यक होने के बावजूद यदि तुम उसे चुप न करा पाओ तो यह तुम्हारी कमी है। नृशंसता और पशुता तो मुहम्मद द्वारा सिखाई ही गई है पर तुम यदि ऐसे लोगों को भजन सुनाओ तो वो तुम्हारी मूर्खता है।

सच्चाई तो यह है कि अल्लाह के बन्दे एक बार फिर हँसे है और क़ुरआन के अनुसार उन्हें जन्नत मिलना तय है। आख़िर 186 काफ़िरों को मौत के घाट उतारने के बाद तो अल्लाह ने इन्हें इतना सबाब दिया होगा कि इनकी आने वाली पीढ़ियों को भी जन्नत का पासपोर्ट मिल जाएगा।

बस रोई है तो केवल भारत माता। रोए हैं तो हमारे तमाम हिन्दू भाई जो बिना बात के इस्लाम की बलि चढ़ गए। क्या तुम्हें इनका क्रंदन नहीं सुनाई देता। अगर नहीं तो तुमसे बड़ा नपुंसक इस पूरे विश्व में नहीं है। तुम ऐसे ही यदि सेक्युलर बनते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब यह ऐसा ही नंगा नाच पूरे देश में दिखाएँगे। रसूल और अल्लाह की शिक्षा ऐसे ही फैलाएँगे। तुमने इस तथ्य को अभी भी नकारा तो ध्यान रखो अन्त समीप है।

9 टिप्‍पणियां:

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

प्रखर हिंदुत्व भी एक छलावा है . किसी काम का नहीं बेकार . अरे राम के बन्दों तुम्हे किसने हसने से रोका . सिर्फ चूल्हों पर तलवार चलाना जानते हो . तुम सब सत्ता की ओर जाने की इच्छा रखते हो . कंधार के बारे मे क्या राय है , कोठारी भाइयो के परिवार को देखा कभी १९९० के बाद

बवाल ने कहा…

भाई साहब,
हिन्दुओं की आँखें तो कुम्भकर्ण को मात कर डालें. हटाओ यार क्या बिलख़ने में लग पड़े हो. गुज़रे ज़मानों से विष्णु-भगत और शिव-भगत ही एक नहीं हैं. आप क्या समझते हैं ? ईसाइयों में एका है या वो जागे हैं ! उनके पहले भाई ने ही दूसरे भाई का मर्डर कर डाला था, पढ़िए ज़रा इंजील को. औलादे-आदम. मिलते जुलते ही तो ये आपके अल्लाह के नेक बन्दे वगैरह भी हैं. इनके यहाँ भी कुछ ख़ास फ़र्क नहीं बस ईव का हौआ बनाए बैठे हैं. महज़ तलफ़्फ़ुस ही की तो बात है. ऊपर वाला हमको बनाता रहता है और क्या. उसको हिंदुत्व पसंद न होता, इस्लाम पसंद न होता या ईसाइयत पसंद न होती तो कभी का ख़त्म कर चुका होता इन सब मज़हबों को. आप बेकार ख़ूँ न जलाया कीजिये. सब दोष ऊपर वाले का या कहें मर्ज़ी ऊपर वाले की हुआ करती है. हम व्यर्थ दिल जलाते रहते हैं. मुस्लमान मुसलमानों को ही मारे पड़े हैं देखिये न ईराक़-ईरान, पकिस्तान-अफ़गानिस्तान आदि आदि आदि... .
बताइए हद है के नहीं ?

COMMON MAN ने कहा…

main aapse poori tarah se to sahmat nahin hoon wo isliye kyonki kuchh muslim bhi utne hi samarpit hain jitne ki hindoo (lekin bahusankhyak muslim nahin), lekin phir bhi hindoo agar ab bhi n chete to bachenge hi nahin.

umeshawa ने कहा…

Vetican could have hired 10 young terrorists in village of pakistan to run the operation for less then one lac US Dollars. The way Sonia (Vetican's Agent) is working, I beleive that she is interested in creating more and more hatred among Hindu & Muslims. We should have caution. We should not leave the path of Mahatma Gandhi. Because it only has the ultimate solution for all.

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

मैं शुरू से ही आपके सारे लेख पढ़ता रहा हूँ एवं दूसरों को भी पढाता रहा हूँ ! बस समयाभाव के कारण कमेन्ट नही कर पाता था ! जिसका मुझे बेहद अफ़सोस है ! आपके विचार आत्म मंथन करने को विवश करते हैं ! आख़िर हमारे नेता - भाग्यविधाता कब तक शोक संदेश देते रहेंगे ? कब तक शहीदों की याद में दीपक और मोमबत्तियां प्रज्ज्वलित करते रहेंगे ? आख़िर कब तक आतंकवादियों को चेतावनी देती जाती रहेंगी ? अयोध्या ...अक्षरधाम......विश्वनाथ......कानपुर......लखनऊ......दिल्ली.......गुजरात.....मुंबई.... यहाँ तक कि हमारी संसद भी निशाना बनी ! लेकिन हम मूक बने तमाशा देखते रहे !
मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि बाहर के दुश्मनों से निपटने में हम पूर्ण सक्षम हैं किंतु आस्तीन में पल रहे साँपों से कब निबटेंगे ?
आज भारत के अन्दर न जाने कितने छोटे-छोटे पाकिस्तान बन चुके हैं ....... लेकिन हाय ये वोट की राजनीति ,,,,,,,, मून्दहूँ आँख कितऊ कछु नाहीं ! एक बात और मै पूछना चाहता हूँ इन मुसलामानों से कि इन्हे हिन्दुस्तान में हर चीज शरीयत के हिसाब से चाहिए ,,,, तो फिर दंड व्यवस्था (गुनाह की सजा) शरीयत के हिसाब से क्यूँ न दी जाए ! काहे जेल में बंद सैकडों आतंकवादियों पर करोड़ों रुपये बरबाद किए जाते हैं ! क्यूँ न मुस्लिम देशों की तरह सबका सिर सरे आम कलम कर दिया जाए ! मन बहुत भरा हुआ है ! दिल जब बहुत कुछ कहना चाहता है ...... तो कुछ भी कहा नही जाता !
जिस दिन मुम्बई पर सूअर रुपी पागल कुत्तों ने कायराना हमला किया था उस दिन एक ब्लॉग पर कविता पढ़ी थी जो सबको पढ़नी चाहिए -

यह शोक का दिन नहीं,
यह आक्रोश का दिन भी नहीं है।
यह युद्ध का आरंभ है,
भारत और भारत-वासियों के विरुद्ध
हमला हुआ है।
समूचा भारत और भारत-वासी
हमलावरों के विरुद्ध
युद्ध पर हैं।
तब तक युद्ध पर हैं,
जब तक आतंकवाद के विरुद्ध
हासिल नहीं कर ली जाती
अंतिम विजय ।

जब युद्ध होता है
तब ड्यूटी पर होता है
पूरा देश ।
ड्यूटी में होता है
न कोई शोक और
न ही कोई हर्ष।
बस होता है अहसास
अपने कर्तव्य का।

यह कोई भावनात्मक बात नहीं है,
वास्तविकता है।
देश का एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री,
एक कवि, एक चित्रकार,
एक संवेदनशील व्यक्तित्व
विश्वनाथ प्रताप सिंह चला गया
लेकिन कहीं कोई शोक नही,
हम नहीं मना सकते शोक
कोई भी शोक
हम युद्ध पर हैं,
हम ड्यूटी पर हैं।

युद्ध में कोई हिन्दू नहीं है,
कोई मुसलमान नहीं है,
कोई मराठी, राजस्थानी,
बिहारी, तमिल या तेलुगू नहीं है।
हमारे अंदर बसे इन सभी
सज्जनों/दुर्जनों को
कत्ल कर दिया गया है।
हमें वक्त नहीं है
शोक का।

हम सिर्फ भारतीय हैं, और
युद्ध के मोर्चे पर हैं
तब तक हैं जब तक
विजय प्राप्त नहीं कर लेते
आतंकवाद पर।

एक बार जीत लें, युद्ध
विजय प्राप्त कर लें
शत्रु पर।
फिर देखेंगे
कौन बचा है? और
खेत रहा है कौन ?
कौन कौन इस बीच
कभी न आने के लिए चला गया
जीवन यात्रा छोड़ कर।
हम तभी याद करेंगे
हमारे शहीदों को,
हम तभी याद करेंगे
अपने बिछुड़ों को।
तभी मना लेंगे हम शोक,
एक साथ
विजय की खुशी के साथ।

याद रहे एक भी आंसू
छलके नहीं आँख से, तब तक
जब तक जारी है युद्ध।
आंसू जो गिरा एक भी, तो
शत्रु समझेगा, कमजोर हैं हम।

इसे कविता न समझें
यह कविता नहीं,
बयान है युद्ध की घोषणा का
युद्ध में कविता नहीं होती।

चिपकाया जाए इसे
हर चौराहा, नुक्कड़ पर
मोहल्ला और हर खंबे पर
हर ब्लाग पर
हर एक ब्लाग पर।

swapnila ने कहा…

WAQUI AAP KITANE GHRINIT HO SAKTE HAI....ISKA NAJARA AAPKE COMMENT ME NAJAR AATA HAI......AAP JAISE LOG JO SIRF APNI SOCH KO SAHI MANTE HAI KISI PAGAL SE KAM NAHI HOTE.....KAHI PAR COMMENT KARANE SE PAHLE APNE SAMARTHY KO JANCH LE.....KOI ANKUS NAHI HAI N AAP PAR...ISLIYE JO CHAHE WO LIKH DENGE..AAP JAISO KE LIYE LEKHAN KI DUNIA ME JAGAH NAHI HAI....ACHHA HOGA KI KISI BHI VYAKTI KO LAJJIT KARNE SE PAHLE KHUD PAR SHARM KAR LIJIYE....AAP KA KUCH KIAA NAHI JA SAKTA ....AAPNE WO KAM KIAA HAI KI AAPKO MAPH NAHI KIAA JA SAKTA.....KAUN SAMAMNANIYA HAI AUR KAUN NAHI....ISKA NIRDHARAN AAP NAHI KARENGE....HIMMAT HAI TO KHULKAR SAMNE AAAIYE...AISE HI NAHI KI KAHI BHI GHUS JAAIYE AUR JO MAN CHAHA LIKH DENGE...PLZ REQUEST HAI....UNHI LOGO KI BARE ME TIPARI KARE ...JINHE AAP WAQUI JANTE HO....VYAKARAN KE KANDHO PAR HAMESA NAHI BAITHA JANA.....OK!

मलय ने कहा…

शत प्रतिशत सहमति है, आपके विचारों से...। धन्यवाद।

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" ने कहा…

shukriya
aapake blog ka shkshm vachan kar tippani doonga aaj hee yata se louta hoon
sadar

अंग्रेज़ी बोलना सीखें ने कहा…

अरे ये कैसी सोच है! यार कुछ तो सुधर जाओ !