रविवार, 7 दिसंबर 2008

टिप्पणी पर टिप्पणी

मैं इस ब्लॉग के माध्यम से जहाँ अपनी बातें कई समान विचारधारा रखने वाले लोगों तक पहुँने में सफल हुआ हूँ वहीं कई राष्ट्रद्रोहियों और मूर्ख सेक्युलरवादियों ने दिल खोलकर मेरी निन्दा की है। ऐसे देशद्रोहियों को तिलमिलाते, छटपटाते और कराहते देखने में मुझे और मेरे कई साथियों को हर्ष व गर्व की मिश्रित अनुभूति हुई। एक ऐसे ही भाई हैं आलोक कुमार पाण्डेय जिन्होंने साम्यवाद पर हमारे प्रहारों से विचलित होकर कुछ इस तरह की टिप्पणी दी है-


"आप जैसे पागल लोगों ने इस देश को कत्लोगारत का मैदान बना दिया है।
भगत सिंह ने कहा था सांप्रदायिक होना इंसानियत का दुश्मन होना है ...आप हैं
हिन्दुस्तान किसीके बाप का नहीं है
खदेडा मोदी को करकरे के घरवालों ने भी था उसकी बात क्यों नहीं करते?
लाशों पर सत्ता के महल बनाने वालों के अंत से ही यह देश प्रगति करेगा
और ये होगा ही।"



इस पर भी इन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लीजिए दूसरी टिप्पणी चिपका दी-

"राष्ट्रवाद भी विदेशों में ही जन्मा है ... ये लेखक हिटलर की किताब पढता है और मार्क्सवाद को गाली देता है"


मैं बताता हूँ इसमें ऐसे लोगों की क्या मंशा होती है। असल में इन लोगों के पास कहने को कुछ ठोस होता नहीं क्योंकि इन्होंने बाबा मार्क्स के आगे कुछ सोचा ही नहीं। जो उन्होंने अपनी किताब में लिखा वो इन्होंने कण्ठस्थ कर अपने गर्धवालाप में प्रस्तुत कर दिया। साथ में अपनी इस घटिया बात को भगत सिंह जैसे देशभक्त की बात से भी अलंकृत कर दिया।

इन भाई साहब को यह भी लगता है कि मैंने अपने सारे विचार केवल हिटलर की माइन कैम्फ़ (शायद इसका ये नाम नहीं जानते) पढ़ कर बनाए हैं। कल को यदि आपको मेरे ब्लॉग पर यह सूक्ति पढ़ने को मिले-

“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”

तो राष्ट्रवाद को विदेशी विचारधारा बताने वाले पाणडेय जी के अनुसार मैंने यह भी हिटलर की किताब से उठाई होगी। खैर अब सिद्ध करने या तर्क देने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि कम्युनिस्टों का भेद अपने आप खुल चुका है।

इसलिए हे देशभक्तों!! जनता को रोटी कपड़ा और मकान को अहमियत और राष्ट्रवाद को ताक पर रखने वाली विचारधारा का अन्त समीप है। तुम्हें अपनी ठोकरों से साम्यवाद की गिरती दीवार पर प्रहार करके उसका खात्मा करना है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 16 साल पहले तुमने कुछ देर में ही बाबरी मसजिद को मटियामेट कर दिया था।

ईमेल- matribhoomibharat@gmail.com

6 टिप्‍पणियां:

Yusuf ने कहा…

"तिलमिलाते, छटपटाते और कराहते देखने में मुझे और मेरे कई साथियों को हर्ष व गर्व की मिश्रित अनुभूति हुई"
kya baat hai
aisi hi bhavna aatankiyon ki bhi hoti hai kya koi fark hai isme?
sharmnaak

umeshawa ने कहा…

वास्तव मे ब्लाग की सुविधा से व्यस्थित-देशभक्त-मौलिक ढंग से सोचने वालो को अपनी अभिव्यक्ति का एक अच्छा साधन मिल गया है। जबकि मिडीया मे उन देशद्रोही वामपंथियो का एकाधिकारपुर्ण कब्जा हीं है। इन्दिरा गांधी ने देश के सारे बौद्धिक संस्थाओ को इन हरामियो के हवाले कर दिया था - वहां बैठ कर सरकारी धन खाते हुए ये हरामी देश विरोधी विचारधाराओ को दार्शनिक आवरण मे लपेट कर पेश करते रहे। इन्होने खुद को बौद्धिक वेश्याओ की तरह पेश किया और वेटीकन जैसी संस्थाओ ने भी इनके आगे रोटी फेंक कर अपना मन चाहा काम इनसे करवाया।

आप लिखने का काम और सत्य को प्रकाशित करने काम जारी रखे। साधुवाद

विनय ने कहा…

मैं किसी के विनाश की नहीं अपनी उनन्ति की सोचता हूँ, पर मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि क़ुरान में ऐसा लिखा है कि इस्लाम क़ुतबों(छोटे समूह) में बँटकर स्वयं समाप्त हो जायेगा। जबकि हिन्दु धर्म में ऐसी कोई मान्यता नहीं!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

किसी विषय का पूर्ण अध्ययन किए बिना ,पूरी जानकारी प्राप्त किए बिना कोई विचार धारा बना लेना कहाँ तक उचित होता है ये मैं नहीं समझ पाऊंगा / अध्ययन करके एक बात तो बुरी बताओ

चन्दन चौहान ने कहा…

आप जैसे पागल लोगों ने इस देश को कत्लोगारत का मैदान बना दिया है।

आज तक हिन्दु ने कभी किसी को नही मारा हिन्दु एक यैसा गाय है जिसके पास सिंग तो है लेकिन मक्खी भगाने के लिये अपने पुछ का उपयोग करती है।

भगत सिंह ने कहा था सांप्रदायिक होना इंसानियत का दुश्मन होना है ...आप हैं

झूठी बात है यै भगत सिंह ने यैसा कभी नही कहा है। सचिंद्रनाथ सान्याल के जरिए ही भगत सिंह 1924 में क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे. क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ने के बाद भी इस बात के प्रमाण हैं कि भगत सिंह 1928 तक आर्यसमाज से जुड़े रहे. वो 1928 में जब कलकत्ता गए तो आर्यसमाज में ही रुके थे| भगत सिंह की शहादत की खूँटी पर वामपंथी अपनी मुर्दा विचारधारा की लाश लटकाने की कोशिश कर रहे हैं| दरअसल, वामपंथी भगत सिंह की शहादत को आज भी भुनाना चाहते हैं ताकि उनकी लगभग मर चुकी विचारधारा और पार्टी में फिर से कुछ दमखम आ सके|

ये लेख पढ़ लो
http://ckshindu.blogspot.com/2007/09/blog-post_5889.html

हिन्दुस्तान किसीके बाप का नहीं है

हिन्दुस्तान मेरे बाप का है इस हिन्दुस्तान को बनाने हमारे बाप दादाओं का खुन लगा है अब अगर कोई हरामी इसे बर्बाद करेगा तो हम सभी आख बन्द करके नहीं बैठेगें। अपने सत्ता बचाने के लिये जिसने अबने ब‌हू-बेटी तक को मुगलों के हवाले किया, रायबहादूरी, चौधरी के खिताब पाने के लिये जिसने अंग्रेजों का तलवा चाटा उसे लगता है कि हिन्दुस्तान किसी के बाप का नहीं है|

खदेडा मोदी को करकरे के घरवालों ने भी था उसकी बात क्यों नहीं करते?
भगवान सब देखता है इससे ज्यादा कुछ नही कहूगा। किसके साथ क्या हूआ संसार देख रहा है।

लाशों पर सत्ता के महल बनाने वालों के अंत से ही यह देश प्रगति करेगा और ये होगा ही

इस देश में प्रगति होगा इसमें कोई शंका नही है लेकिन कौन करेगा प्रगती हमें ये देखना है। जो बच्चा अपनी माँ के गर्भ के समय से ही अमेरिका का ग्रिन कार्ड और विजा का सपना देखता हो अगर वैसे आदमी देश प्रगति का बात करें तो हँसी आती है।

राष्ट्रवाद भी विदेशों में ही जन्मा है

जब विदेशीयों को राष्टृवाद का ABCD भी नही पता था तब भगवान श्री राम ने श्री लंका जा कर राष्टृवाद का प्रचार किया था में पहले ही कह चूका हू कि अपने सत्ता बचाने के लिये जिसने अपने ब‌हू-बेटी तक को मुगलों के हवाले किया, रायबहादूरी, चौधरी के खिताब पाने के लिये जिसने अंग्रेजों का तलवा चाटाने में जिस‌ने अपना समय लगाया है उसे क्या पता कि राष्ट्रीयता क्या चिज है हिन्दुस्तान प्रगती करेगा लेकिन यैसे तत्व जब तक हिन्दुस्तान में रहेंगे जिन्हें अपने संस्कृ्ती, संस्कार के बारे में पता नही है जिन्हें लगता है कि हिन्दुस्तान में जो कुछ भी है विदेशीयों की ही देन है यैसे आदमी जब तक हिन्दुस्तान में रहेंगा हिन्दुस्तान कभी प्रगती नही करेगा।

http://ckshindu.blogspot.com

Ram ने कहा…

Ya u had rightly sid................
Ur thougts are rally patriotic......
keep writing india needs a person like u..................
May god will give u what u want in ur life.

Vande Matram