हे देशप्रेमियों!
हमने देखा पिछले कुछ महीनों से इस्लामपरस्तों ने अपने देशद्रोह का परिचय किस तरह दिया। कभी बम धमाके करके तो कभी आतंकवादियों को श्रद्धांजलि दे कर। जब जब निर्दोष हिन्दू मारे गए तब तब हमने किसी तौकीर, किसी अबू बशर को उस घटना के पीछे हँसता हुआ पाया। पर किसी ने नहीं सोचा कि ये मुसलमान हर बार इतनी शिद्दत से गद्दारी और पशुत्व की नई बुलन्दियाँ छूने की प्रतिभा और साहस लाते कहाँ से हैं? क्यों यह भारतभूमि इन्हें अपनी सी नहीं जान पड़ती?
मैं बताता हूँ। हर मुसलमान जब सजदे के लिए झुकता है तो उसका मुँह मक्का की ओर रहता है। मक्का यानी सऊदी अरब। रसूल के भेड़ियों का देश। जब किसी की आस्था के तार वहाँ से जुड़े हों उससे भारत से वफ़ादारी की उम्मीद रखना किसी समझदार व्यक्ति का काम तो हो नहीं सकता।
भारत का हर मुसलमान चाहे वो शिया हो या सुन्नी ये मानता है कि उसकी जड़ें यहाँ नहीं अरब, फ़ारस या ऐसे ही किसी म्लेच्छ बहुल देश में है। जबकि हर कोई जानता है कि जो मुलमान भारत में पाए जाते हैं उनके बाप दादा या तो तलवार के डर से या फिर चंद हड्डियों के लालच में मुसलमान बन गए थे। पर इनमें कोई ये मानने को तैयार नहीं कि वो मूल रूप से भारतीय है। कोई कहता है हम तो तुर्क हैं, कोई अपने आपको पठान मानता है, कोई अरब के क़ुरैश क़बीले से अपने तार जोड़ता है।
हालाँकि ये अलग बात है चाहे वो तुर्क हों या अरबी इनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहते। हिन्दुस्तान की ये देशद्रोही क़ौम जब हज पर जाती है तो वहाँ इनका स्थान सबसे पीछे होता है। और वो काला पत्थर इन्हें छूने तो क्या देखने की इजाज़त भी नहीं होती। तो कुल मिलाकर इनकी हालत कुछ कुछ धोबी के एक पशु जैसी है। अपनी मातृभूमि से गद्दारी भी की, रसूल के बन्दों ने भी नहीं अपनाया।
यानी गुनाह -बेलज़्ज़त
तो देशभक्तों, हमें यह समझ लेना चाहिए कि इस देश में यदि कोई देश की असली सन्तान हैं तो वो हम हिन्दू हैं। हमारे पास रक्त की शुद्धता भी है और मिट्टी का अभिमान भी। हमें एक लड़ाई लड़नी है, एक क्रान्ति लानी है क्योंकि हम जानते हैं कि हमारी भारत भूमि ही हमारे अस्तित्व का एकमात्र विकल्प है। इसके अलावा कोई सहारा नहीं।
अगर देर की तो रसूल और अल्लाह की विकृत मानसिकता वाले ये म्लेच्छ हमारी इस परम पूजनीया मातृभूमि को कलंकित करने का प्रयास करेंगे और हमारे पास सिवाय आत्महत्या के कोई और चारा नहीं रहेगा।
आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा रहेगी।
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008
हर बार मुसलमान ही ग़द्दार।
बुधवार, 8 अक्टूबर 2008
वाह रे महात्मा! वाह!!
मेरे कुछ दोस्त मुझ पर आरोप मढ़ते हैं कि मैं इस्लाम के विरुद्ध लिखने के अलावा कुछ और नहीं लिख सकता। कुछ का कहना है कि इतने दिन से कोई विस्फोट नहीं हुआ इसलिए लेखनी की धार मन्द पड़ने लगी है। यह लेख ऐसे ही लोगों के लिए लिख रहा हूँ। यह बताने के लिए कि मेरी कलम की आग बम विस्फोटों के साथ ठण्डी नहीं पड़ सकती। चलिए आज इस्लाम न सही भारत में इस्लाम के कारण की बात करते हैं
कहते हैँ आज़ादी दिलाई थी एक महात्मा ने। मतलब हम नहीं कहते ऐसा कांग्रसियों ने कहा। हमने माना क्योंकि हमारे पुरखों ने तब आँख कान बन्द कर लिए और महात्मा के चेलों ने सत्तासीन होने के लिए बेचारों का लाभ उठाया। चलिए हमें गाँधी के महात्मा होने से भी ऐतराज़ नहीं पर हम जानना चाहेंगे उन तमाम सत्ता के लड्डू चखने वाले कांग्रेसियों से और उन गाँधी टोपी पहनने वालों से कि क्या जवाब है उनके पास इन सवालों के-
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को गाँधी के प्रयासों से बचाया जा सकता था। पर ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या गाँधी देशभक्ति से ज़्यादा राजनीति में दिलचस्पी लेने लग गए थे? क्या उनके ‘करियर’ को देशभक्त क्रान्तिकारियों व उनकी बढ़ती हुई ख्याति से ख़तरा मालूम होने लगा था?
गाँधी ने सत्य और अहिंसा की कसमें खाईं और लोगों को खाने पर मजबूर भी किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान उनकी लाश पर ही बनेगा। पर गाँधी की लाश 14 अगस्त 1947 में नहीं गिरी। अगर वो सत्य के मार्ग पर इतनी शिद्दत से चलते थे तो आत्महत्या क्यों नहीं की?
अंग्रेज़ों के बाद हमारे देश की आर्थिक हालत बहुत ख़राब थी। पर गाँधी के कहने पर 56 करोड़ रुपए पाकिस्तान को दिए गए। क्या हमें या जानने का अधिकार नहीं?
गाँधी ने 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन का ऐलान किया। कुछ कुछ वैसा ही जब प्रथम विश्व युद्ध के शुरुआती दिनों में लोकमान्य तिलक ने ‘कहा था लोहा गरम है चोट करो’। तब गाँधी ने इसे (अंग्रेज़ों की) पीठ पर वार करने जैसा कह के विरोध किया था। क्यों? तीस साल में क्या सारे सिद्धान्त बदल गए? या 1914 में राजनीति में चमकने का अवसर नहीं खोना चाहते थे?
नेहरू ने उन्हें बापू कहा तो देश ने राष्ट्रपिता भी मान लिया? क्यों? पिता का कर्तव्य होता है जन्म देने के बाद अपनी संतान का भरण-पोषण करना पर यहाँ तो महात्मा जी ने उसके दो टुकड़े करा डाले। क्या ये ही राष्ट्र के पिता जी का काम था?
क्यों सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतने पर गाँधी ने उसे अपनी निजी हार बताया?
मुझे लगता है आप सभी पाठक पढ़े लिखे होने के साथ साथ विचारशील और मननशील भी हैं। इसलिए इन प्रश्नों पर एक बार सोचिएगा ज़रूर। सोचने पर आप पाएँगे कि एक एक प्रश्न अक्षरश: सही है।
कहते हैँ आज़ादी दिलाई थी एक महात्मा ने। मतलब हम नहीं कहते ऐसा कांग्रसियों ने कहा। हमने माना क्योंकि हमारे पुरखों ने तब आँख कान बन्द कर लिए और महात्मा के चेलों ने सत्तासीन होने के लिए बेचारों का लाभ उठाया। चलिए हमें गाँधी के महात्मा होने से भी ऐतराज़ नहीं पर हम जानना चाहेंगे उन तमाम सत्ता के लड्डू चखने वाले कांग्रेसियों से और उन गाँधी टोपी पहनने वालों से कि क्या जवाब है उनके पास इन सवालों के-
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को गाँधी के प्रयासों से बचाया जा सकता था। पर ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या गाँधी देशभक्ति से ज़्यादा राजनीति में दिलचस्पी लेने लग गए थे? क्या उनके ‘करियर’ को देशभक्त क्रान्तिकारियों व उनकी बढ़ती हुई ख्याति से ख़तरा मालूम होने लगा था?
गाँधी ने सत्य और अहिंसा की कसमें खाईं और लोगों को खाने पर मजबूर भी किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान उनकी लाश पर ही बनेगा। पर गाँधी की लाश 14 अगस्त 1947 में नहीं गिरी। अगर वो सत्य के मार्ग पर इतनी शिद्दत से चलते थे तो आत्महत्या क्यों नहीं की?
अंग्रेज़ों के बाद हमारे देश की आर्थिक हालत बहुत ख़राब थी। पर गाँधी के कहने पर 56 करोड़ रुपए पाकिस्तान को दिए गए। क्या हमें या जानने का अधिकार नहीं?
गाँधी ने 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन का ऐलान किया। कुछ कुछ वैसा ही जब प्रथम विश्व युद्ध के शुरुआती दिनों में लोकमान्य तिलक ने ‘कहा था लोहा गरम है चोट करो’। तब गाँधी ने इसे (अंग्रेज़ों की) पीठ पर वार करने जैसा कह के विरोध किया था। क्यों? तीस साल में क्या सारे सिद्धान्त बदल गए? या 1914 में राजनीति में चमकने का अवसर नहीं खोना चाहते थे?
नेहरू ने उन्हें बापू कहा तो देश ने राष्ट्रपिता भी मान लिया? क्यों? पिता का कर्तव्य होता है जन्म देने के बाद अपनी संतान का भरण-पोषण करना पर यहाँ तो महात्मा जी ने उसके दो टुकड़े करा डाले। क्या ये ही राष्ट्र के पिता जी का काम था?
क्यों सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतने पर गाँधी ने उसे अपनी निजी हार बताया?
मुझे लगता है आप सभी पाठक पढ़े लिखे होने के साथ साथ विचारशील और मननशील भी हैं। इसलिए इन प्रश्नों पर एक बार सोचिएगा ज़रूर। सोचने पर आप पाएँगे कि एक एक प्रश्न अक्षरश: सही है।
शनिवार, 4 अक्टूबर 2008
हिन्दुओं! प्रण पालन करो
कौन कहता है कि हिन्दुस्तान में एकता नहीं? कौन ये मानता है कि हमारे देश में भाईचारा नहीं? ज़रा अखबारों में देखो। किस तरह से दो आतंकवादियों के मारे जाने के बाद तीन हज़ार लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी ये एकता किसी के लिए भी एक उदाहरण हो सकती है। आज़मगढ़ में उन सच्चे मुसलमानों की शहादत की याद में ईद नहीं मनाई गई। मुसलमान गले नहीं मिले। सेवइयाँ नहीं बनी। इमाम ने कहा इसलाम ख़तरे में है।
अभी भी आपको इस कौम की बेशर्मी नहीं दिखी? या फिर से आपने एक आम हिन्दू की तरह नज़रन्दाज़ कर दिया? कभी आपके मन में ये बात उठी कि धमाकों में इतने हिन्दू मरे हैं तो हम दिवाली न मनाएँ? आप में इतना विवेक ही कहाँ है? आप तो ख़ुश हो गए कि चलो हम और हमारे परिवार तो इन धमाकों से सुरक्षित बच कर निकल आए। हमें तो चोट नहीं लगी। तो फिर चलो मॉल घूमने चलें। नई फ़िल्म देखें। और भगवान को ख़ुश करने के नवरात्र के व्रत की रिश्वत दे देंगे। सब ठीक हो ही जाएगा।
नहीं! कुछ ठीक नहीं होगा। ये सच्चे मुसलमान देश के सच्चे दुश्मन हैं। हर बार तुम्हें ऐसे ही मारेंगे। और कोई राम, कृष्ण, शिव, कल्कि तुम्हें बचाने नहीं आएगा। क्यों? क्योंकि तुम कर्महीन हो। तुम कभी क्रान्ति नहीं करना चाहते। चाहते भी हो तो ये कि अगर चन्द्रशेखर आज़ाद और राम प्रसाद बिस्मिल पैदा हों तो वो तुम्हारे घर नहीं पड़ोसी के यहाँ हों। अरे यही मूर्खता और कायरता हमें रसातल में पहुँचा देगी। तब मॉल घूम सकोगे, ये राग रंग चल पाएँगे?
इन नर पिशाचों पर दया करना धर्म नहीं, नीति नहीं। वेद के अनुसार
यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद् वस्तावधि संश्रुतम्।
एका ते मूत्रम् मुच्यताम् बहिर्वालिति सर्वकम्।।
-अथर्व काण्ड १ सूक्त ३ मंत्र ६
अर्थात् जैसे कि आँतों में और नाड़ियों में और मूत्राशय के भीतर जमा मल मूत्र कष्ट देता है और उसको निकाल देने से चैन मिलता है वैसे ही मनुष्य को शारीरिक, आत्मिक और सामजिक शत्रुओं को निकाल देने से सुख प्राप्त करता है।
ये रक्तबीज मुसलमान भी ऐसे ही सामाजिक शत्रु हैं जिनके निकालने से हमारे देश को चैन मिलेगा। अभी भी इनको पालते रहे, इनके ज़ुल्मों के सहते रहे तो हमारा देश रोगी हो जाएगा। सोचो और विचारो।
अगर टिप्पणी नहीं करना चाहते तो मुझ़े मेल करो matribhoomibharat@gmail.com पर।
शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008
मातृभूमि की पुकार
मेरे पिछले और इस आलेख के बीच में फिर से तीन जगह धमाके हो चुके हैं। कई और लोगों की जानें गईं। गृह मन्त्री कभी अपनी तो कभी पुलिस की बगलें झाँकते नज़र आए। हमें भी लोगों को भी पता है कि इन घटनाओं में हूजी, सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे किसी इस्लामवादी संगठन का नाम सामने आएगा। कुछ शोर होगा फिर अगले धमाके तक शान्ति हो जाएगी। तूफ़ान से पहले की शान्ति। श्मशान की शान्ति। नपुंसकों की शान्ति। गाँधी की शान्ति।

मूर्ख कहीं के!! इतना सब होने के बाद भी रटेंगे ईश्वर अल्लाह तेरो नाम। सौहार्द्र के नारे लगाएँगे। प्रेम और अहिंसा के सैकड़ों साल पुराने राग का गर्धव अलाप करेंगे। लेकिन बात यदि होगी क्रान्ति के आह्वान की तो अपने में दड़बों में छिप जाएँगे।
पर अब समय आ गया है कि हमें निर्णय कर लेना चाहिए कि हमें एक सच्चे भारतीय की तरह सम्मान से जीना है या फिर इसलाम के जूते के नीचे ख़ुद को कुचलवाना है। कुछ देर हम और रुके, और थमे या सोचने लगे कि सब ठीक हो गया है तो ये अल्लाह के नेक बन्दे हमें ठिकाने लगाने के लिए फिर से तैयार हो जाएँगे। पर क्या करें अपनी क़ौम के ग़द्दारों से भी पार पाना ज़रूरी है। एकता मंच पर आतंकवादियों(मुसलमानों) के साथ शान्ति की बातें बनाने वालों को भी ठिकाने लगाना आवश्यक है।
इसलिए हे समान विचारधारा वालों मिल जाओ। हम जानते हैं कि हम कम है। हमारा धर्म अभी एकजुट नहीं, हमारे हाथों में हथियार नहीं, हमारे पास वो संख्या भी नहीं। पर हमारे पास इच्छाशक्ति है जो कि हम जैसे सोलह भी सोलह करोड़ पर भारी पड़ेंगे। रक्त की पवित्रता का परिचय दो। देशभक्ति का यज्ञ है सर्वस्व होम करने का दम रखो। वीरगति को प्राप्त हुए तो मोक्ष मिलेगा, विजय हुई तो सांसारिक सुख। निर्णय तुम्हें करना है।
पर अब समय आ गया है कि हमें निर्णय कर लेना चाहिए कि हमें एक सच्चे भारतीय की तरह सम्मान से जीना है या फिर इसलाम के जूते के नीचे ख़ुद को कुचलवाना है। कुछ देर हम और रुके, और थमे या सोचने लगे कि सब ठीक हो गया है तो ये अल्लाह के नेक बन्दे हमें ठिकाने लगाने के लिए फिर से तैयार हो जाएँगे। पर क्या करें अपनी क़ौम के ग़द्दारों से भी पार पाना ज़रूरी है। एकता मंच पर आतंकवादियों(मुसलमानों) के साथ शान्ति की बातें बनाने वालों को भी ठिकाने लगाना आवश्यक है।
इसलिए हे समान विचारधारा वालों मिल जाओ। हम जानते हैं कि हम कम है। हमारा धर्म अभी एकजुट नहीं, हमारे हाथों में हथियार नहीं, हमारे पास वो संख्या भी नहीं। पर हमारे पास इच्छाशक्ति है जो कि हम जैसे सोलह भी सोलह करोड़ पर भारी पड़ेंगे। रक्त की पवित्रता का परिचय दो। देशभक्ति का यज्ञ है सर्वस्व होम करने का दम रखो। वीरगति को प्राप्त हुए तो मोक्ष मिलेगा, विजय हुई तो सांसारिक सुख। निर्णय तुम्हें करना है।
बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
विभीषण नहीं कृष्ण बनिए
मित्रों मुझे इस ब्लॉग को आरमभ करे मात्र कुछ ही दिन हुए हैं पर लोगों का ध्यान व उनकी टिप्पणियाँ प्राप्त होने लगी हैं। जिनको देखकर मैंने पाया कि बहुत कम हिन्दू ऐसे हैं जो इस ब्लॉग से प्रसन्न हैं। अन्य सभी ये मानते हैं कि मेरे विचार अतिवादी और सच्चाई से परे हैं। कइयों ने कहा कि क्रान्ति ब्लॉग के माध्यम से नहीं होती। मैं कहता हूँ हे जयचंदों! क्या आपने ही अपने धर्म के विनाश का ठेका ले रखा है? कुछ काम सच्चे मुसलमानों को भी तो करने दीजिए।
मैंने पांचजन्य और ऑर्गनाइज़र दोनों ही पढ़े हैं और पाया कि उनके आलेखों में वो जान, वो जज़्बा नहीं था। लेखनी जैसे विलाप कर रही थी। कभी मन्दिरों के तोड़े जाने का, कभी पाकिस्तानी हिन्दुओं की स्थिति का, कभी किसी संन्यासी की हत्या का और कभी धर्मांतरण का हवाला देकर दिन्दुओं को जगाने की नाकाम कोशिश की जा रही थी।
इसलिए मैंने जो आलेख इस ब्लॉग में प्रकाशित किए उनमें कहीं भी कोई आत्मदया का सुर नहीं था, बस सच था... वो सच जो हम वर्षों से नज़रन्दाज़ करते आए हैं... वो सच जो हमारे पूर्वजों ने नकारा और हानि उठाई। अब मैं लोगों को जगाने का काम कर लहा हूँ तो क्यों आपत्ति है, क्यों कुछ लोगों के पेट में दर्द हो रहा है?
मेरी जन्मभूमि पर अत्याचार हो रहा है तो मैं क्यों चुप रहूँ? मैं औरों की तरह अल्लाह के बन्दों के हाथों मरने नहीं आया। मैं किसी बम हादसे का भी शिकार नहीं होऊँगा। मैं किसी सरकार के हाथों की भी कठपुतली नहीं। मैं इतना निर्बल नहीं जो लोगों की टिप्पणियों से अपनी विचारधारा के मार्ग को परिवर्तित कर दूँगा। हो सकता है कि आज कुछ निर्जीव हिन्दुओं को मेरी बात का ‘लॉजिक’ न समझ में आए पर मैं आशान्वित हूँ कि भविष्य में ऐसा अवश्य होगा और तब इस देश की हिन्दू राष्ट्र की कल्पना साकार होगी। इसलिए हे मूर्खों अधर्म के इस युग में विभीषण मत बनो क्योंकि तुम जैसे घर के भेदियों से पहले ही हमारी मातृभूमि का सीना छलनी है।
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:,
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनाम् विनाशायच दुष्कृता
धर्मसंस्थापनार्थाय संभावामि युगे युगे”
मैंने पांचजन्य और ऑर्गनाइज़र दोनों ही पढ़े हैं और पाया कि उनके आलेखों में वो जान, वो जज़्बा नहीं था। लेखनी जैसे विलाप कर रही थी। कभी मन्दिरों के तोड़े जाने का, कभी पाकिस्तानी हिन्दुओं की स्थिति का, कभी किसी संन्यासी की हत्या का और कभी धर्मांतरण का हवाला देकर दिन्दुओं को जगाने की नाकाम कोशिश की जा रही थी।
इसलिए मैंने जो आलेख इस ब्लॉग में प्रकाशित किए उनमें कहीं भी कोई आत्मदया का सुर नहीं था, बस सच था... वो सच जो हम वर्षों से नज़रन्दाज़ करते आए हैं... वो सच जो हमारे पूर्वजों ने नकारा और हानि उठाई। अब मैं लोगों को जगाने का काम कर लहा हूँ तो क्यों आपत्ति है, क्यों कुछ लोगों के पेट में दर्द हो रहा है?
मेरी जन्मभूमि पर अत्याचार हो रहा है तो मैं क्यों चुप रहूँ? मैं औरों की तरह अल्लाह के बन्दों के हाथों मरने नहीं आया। मैं किसी बम हादसे का भी शिकार नहीं होऊँगा। मैं किसी सरकार के हाथों की भी कठपुतली नहीं। मैं इतना निर्बल नहीं जो लोगों की टिप्पणियों से अपनी विचारधारा के मार्ग को परिवर्तित कर दूँगा। हो सकता है कि आज कुछ निर्जीव हिन्दुओं को मेरी बात का ‘लॉजिक’ न समझ में आए पर मैं आशान्वित हूँ कि भविष्य में ऐसा अवश्य होगा और तब इस देश की हिन्दू राष्ट्र की कल्पना साकार होगी। इसलिए हे मूर्खों अधर्म के इस युग में विभीषण मत बनो क्योंकि तुम जैसे घर के भेदियों से पहले ही हमारी मातृभूमि का सीना छलनी है।
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:,
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनाम् विनाशायच दुष्कृता
धर्मसंस्थापनार्थाय संभावामि युगे युगे”
मंगलवार, 30 सितंबर 2008
रसूल और अल्लाह की समझदारी
सारे मुसलमान मानते हैं कि उनका पन्थ सर्वश्रेष्ठ है और वैज्ञानिक भी। पर हम ‘मासूम हिन्दू’ सर्व धर्म समभाव के मारग पर चल कर उन को अपने बराबर का मान लेते हैं। लेकिन यह देखने की, जानने की कोशिश नहीं करते कि आख़िर इस्लाम में ऐसा क्या है जो वैज्ञानिक है, सबसे अलग है।
हम बताते हैं। कुरआन (शरीफ़???) में जिस विज्ञान का परिचय दिया गया है वो आर्यभट्ट से लेकर नासा के वैज्ञानिकों तक की कल्पने से भी परे है। आइए जानते हैं क्या है वो अद्भुत जानकारी-
“अल्लाज़ी खलक सब्आ समावातिन तिबाका”
-कुरान, सूरत मुल्क, पारा 29, आयत 3
यानी वह ख़ुदा जिसने उत्पन्न किए एक एक करके सात आसमान। ये सात आसमान कुछ इस प्रकार के हैं-
1. पहला समुद्र की एक लहर के समान है;
2. दूसरा संगमरमर का;
3. तीसरा लोहे का;
4. चौथा ताँबे का है;
5. पाँचवाँ आसमान चाँदी का बना है;
6. छठा सोने का है;
7. और सातवाँ याक़ूत (काले मोती) से बना है
अब मूर्खता की सीमा तक अज्ञानी रसूल और अल्लाह को सिखाए कि आसमान कुछ होता ही नहीं बस एक खाली जगह है जहाँ सारे खगोलीय पिण्ड अपनी अपनी गति और कक्षा में विचरण कर रहे हैं? और जो चीज़ है ही नहीं उसके ऊपर उस जैसी छ: और चीज़ों का रखा जाना ‘अति वैज्ञानिक’ मस्तिष्क की वाहियात उपज है।
अब सोचो क्या हम ऐसी घटिया बाते सिखाने वाले अल्लाह और रसूल को अपने ईश्वर के साथ रख सकते हैं। आगे भी आपको ऐसी आँखें खोलने वाली जानकारियाँ दी जाती रहेंगी। तो पढ़ते रहिए और जो पढ़ा है उस पर एक बार ज़रूर सोचिए।
हम बताते हैं। कुरआन (शरीफ़???) में जिस विज्ञान का परिचय दिया गया है वो आर्यभट्ट से लेकर नासा के वैज्ञानिकों तक की कल्पने से भी परे है। आइए जानते हैं क्या है वो अद्भुत जानकारी-
“अल्लाज़ी खलक सब्आ समावातिन तिबाका”
-कुरान, सूरत मुल्क, पारा 29, आयत 3
यानी वह ख़ुदा जिसने उत्पन्न किए एक एक करके सात आसमान। ये सात आसमान कुछ इस प्रकार के हैं-
1. पहला समुद्र की एक लहर के समान है;
2. दूसरा संगमरमर का;
3. तीसरा लोहे का;
4. चौथा ताँबे का है;
5. पाँचवाँ आसमान चाँदी का बना है;
6. छठा सोने का है;
7. और सातवाँ याक़ूत (काले मोती) से बना है
अब मूर्खता की सीमा तक अज्ञानी रसूल और अल्लाह को सिखाए कि आसमान कुछ होता ही नहीं बस एक खाली जगह है जहाँ सारे खगोलीय पिण्ड अपनी अपनी गति और कक्षा में विचरण कर रहे हैं? और जो चीज़ है ही नहीं उसके ऊपर उस जैसी छ: और चीज़ों का रखा जाना ‘अति वैज्ञानिक’ मस्तिष्क की वाहियात उपज है।
अब सोचो क्या हम ऐसी घटिया बाते सिखाने वाले अल्लाह और रसूल को अपने ईश्वर के साथ रख सकते हैं। आगे भी आपको ऐसी आँखें खोलने वाली जानकारियाँ दी जाती रहेंगी। तो पढ़ते रहिए और जो पढ़ा है उस पर एक बार ज़रूर सोचिए।
रविवार, 28 सितंबर 2008
मोहन शर्मा की शहादत से ख़तरे में इसलाम
दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों के बाद दिल्ली पुलिस ने अब तक जो भी किया है वह निश्चय ही प्रशंसनीय है। हमने देखा किस तरह से एक एनकाउण्टर के दौरान इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा ने अपनी शहादत दी और कॉंस्टेबल बलवन्त राणा घायल हुए।
जामिया नगर(सराय दहशतग़र्द) में हुई मुठभेड़ ने देश की जनता में आशा का संचार किया। पर पुलिस को क्या मालूम था कि उसके केवल दो लोगों की वीरता से सारा इस्लाम ख़तरे में पड़ जाएगा। जब इमाम बुख़ारी साहब ने मारे गए आतिफ़ और साज़िद की कब्रों का सजदा किया तो उन्हें इलहाम हुआ कि वो दिल्ली पुलिस का षडयंत्र था। फिर उन्होंने मीडिया के सामने एक बयान दिया जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस पर ही शर्मा साहब की हत्या का आरोप लगा दिया। उनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? अब पैग़म्बर मुहम्मद के बाद जो भी ख़लीफ़ा बना पिछले ख़लीफ़ा को क़त्ल कर के बना। ऐसे गिरोह... क्षमा कीजिएगा क़ौम के एक अदना से सिपाही से अच्छा सोचने की आशा रखना हमारी ही मूर्खता का परिचायक होगा।
अब बताइए क्या करे पुलिस? बम विस्फोट हो जाएँ तो आफ़त, आरोपी पकड़े जाएँ तो अलपसंख्यकों पर अत्याचार, मुठभेड़ में आतंकियों को मारे तो हत्यारी। ऊपर से आतंकवादियों पर दया दृष्टि रखकर मुसलमानों के वोट पाने की उम्मीद में बैठी सरकार। यानी कोढ़ में खाज।
ख़ैर हम बचपन से एक कहावत सुनते आए है- “हाथी चला जाता है कुत्ते भौंकते रह जाते हैं”। दिल्ली पुलिस ने तो अपना काम कर दिया अब बुख़ारी साहब अपना काम कर रहे हैं।
जामिया नगर(सराय दहशतग़र्द) में हुई मुठभेड़ ने देश की जनता में आशा का संचार किया। पर पुलिस को क्या मालूम था कि उसके केवल दो लोगों की वीरता से सारा इस्लाम ख़तरे में पड़ जाएगा। जब इमाम बुख़ारी साहब ने मारे गए आतिफ़ और साज़िद की कब्रों का सजदा किया तो उन्हें इलहाम हुआ कि वो दिल्ली पुलिस का षडयंत्र था। फिर उन्होंने मीडिया के सामने एक बयान दिया जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस पर ही शर्मा साहब की हत्या का आरोप लगा दिया। उनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? अब पैग़म्बर मुहम्मद के बाद जो भी ख़लीफ़ा बना पिछले ख़लीफ़ा को क़त्ल कर के बना। ऐसे गिरोह... क्षमा कीजिएगा क़ौम के एक अदना से सिपाही से अच्छा सोचने की आशा रखना हमारी ही मूर्खता का परिचायक होगा।
अब बताइए क्या करे पुलिस? बम विस्फोट हो जाएँ तो आफ़त, आरोपी पकड़े जाएँ तो अलपसंख्यकों पर अत्याचार, मुठभेड़ में आतंकियों को मारे तो हत्यारी। ऊपर से आतंकवादियों पर दया दृष्टि रखकर मुसलमानों के वोट पाने की उम्मीद में बैठी सरकार। यानी कोढ़ में खाज।
ख़ैर हम बचपन से एक कहावत सुनते आए है- “हाथी चला जाता है कुत्ते भौंकते रह जाते हैं”। दिल्ली पुलिस ने तो अपना काम कर दिया अब बुख़ारी साहब अपना काम कर रहे हैं।
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